A great modern day vedantic work presented as a dialogue between teacher and disciple. The author has beautifully explained subtle vedantic concepts in an easy to understand way. The language is simple almost harsh at times, reminding me of Kabir's work. Author's original take on words such as veda and guru etc. shows that he has deep understanding of Hindu philosophy and has been practicing it for a while.
Whether you have been a seeker for years or just starting your journey this text would definitely help.
सुसुप्ति अवस्था का आनंद क्षणिक क्षणभंगुर अनित्य होता है। आनंद महसूस हुआ तो मेरे लिए यह दृश्य हुआ। दृग दृश्य विवेक अनुसार यह आनंद मैं नही हुआ। । आनंद भी परिच्छिन्न आनंद महसूस करने वाला भी परिच्छिन्न हुआ। क्या आनंद और आनंद को महसूस करने वाला इन दोनों का साक्षी ही सत्य है?
प्रकृति में केवल तीन ही ताप होता है , दैविक ताप दैहिक ताप भौतिक ताप । खुशी की बात है ये सभी ताप तभी प्रभावी होते हैं जब कोई खुद को शरीर इन्द्रियां अंतःकरण समझता है और जो शरीर इन्द्रियां अंतःकरण के आयाम से बाहर निकल गया है वह ताप त्रय से मुक्त है । गर्भाधान से पहले शरीर का कोई अस्तित्व नही होता है यह सत्य जो जानता है वह यह भी स्वीकार करता है कि वह शरीर इन्द्रियां अंतःकरण नहीं है। वही कहता है अहं ब्रह्मास्मि।
ब्रह्म को निराकार निर्विकार निर्गुण असंग अखंड अनंत अजर-अमर अविनाशी सत् चित्त आनंद समझते हैं । ब्रह्म किस विधि प्रकृति में फंस सकते हैं? ब्रह्म की अनंत शक्ति हैं। ज्ञान शक्ति निराकार निर्विकार निर्गुण चैतन्य है। क्रिया शक्ति ही विकारी क्रियाशील परिवर्तनशील प्रकृति है जो काल क्षेत्र संयोग का विषय है। संसार श्रीकृष्ण की अपरा प्रकृति अष्टधा प्रकृति और परा प्रकृति चेतना से निर्मित है। पंच महाभूत के अतिरिक्त मन बुद्धि अहंकार अपरा प्रकृति ही है। भोग-विलास हर्ष विषाद राग-द्वेष अंतःकरण का अनुभव है आत्मा का नही। आत्मा भोग-विलास हर्ष विषाद राग-द्वेष से असंग है । इसलिए मुक्ति अहंकार की जरूरत है। वही जीव है ज्ञानोदय होने पर अहंकार को बोध होता है कि अहंकार का कारण ब्रह्म है। जीव अपना प्रारब्ध भोग कर प्रकृति से मुक्त हो जाता है।
A great modern day vedantic work presented as a dialogue between teacher and disciple. The author has beautifully explained subtle vedantic concepts in an easy to understand way. The language is simple almost harsh at times, reminding me of Kabir's work. Author's original take on words such as veda and guru etc. shows that he has deep understanding of Hindu philosophy and has been practicing it for a while.
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May everybody see things as they are.
🙏
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ReplyDeleteसुसुप्ति अवस्था का आनंद क्षणिक क्षणभंगुर अनित्य होता है। आनंद महसूस हुआ तो मेरे लिए यह दृश्य हुआ। दृग दृश्य विवेक अनुसार यह आनंद मैं नही हुआ। । आनंद भी परिच्छिन्न आनंद महसूस करने वाला भी परिच्छिन्न हुआ। क्या आनंद और आनंद को महसूस करने वाला इन दोनों का साक्षी ही सत्य है?
ReplyDeleteप्रकृति में केवल तीन ही ताप होता है , दैविक ताप दैहिक ताप भौतिक ताप । खुशी की बात है ये सभी ताप तभी प्रभावी होते हैं जब कोई खुद को शरीर इन्द्रियां अंतःकरण समझता है और जो शरीर इन्द्रियां अंतःकरण के आयाम से बाहर निकल गया है वह ताप त्रय से मुक्त है । गर्भाधान से पहले शरीर का कोई अस्तित्व नही होता है यह सत्य जो जानता है वह यह भी स्वीकार करता है कि वह शरीर इन्द्रियां अंतःकरण नहीं है। वही कहता है अहं ब्रह्मास्मि।
ReplyDeleteब्रह्म को निराकार निर्विकार निर्गुण असंग अखंड अनंत अजर-अमर अविनाशी सत् चित्त आनंद समझते हैं । ब्रह्म किस विधि प्रकृति में फंस सकते हैं? ब्रह्म की अनंत शक्ति हैं। ज्ञान शक्ति निराकार निर्विकार निर्गुण चैतन्य है। क्रिया शक्ति ही विकारी क्रियाशील परिवर्तनशील प्रकृति है जो काल क्षेत्र संयोग का विषय है। संसार श्रीकृष्ण की अपरा प्रकृति अष्टधा प्रकृति और परा प्रकृति चेतना से निर्मित है। पंच महाभूत के अतिरिक्त मन बुद्धि अहंकार अपरा प्रकृति ही है। भोग-विलास हर्ष विषाद राग-द्वेष अंतःकरण का अनुभव है आत्मा का नही। आत्मा भोग-विलास हर्ष विषाद राग-द्वेष से असंग है । इसलिए मुक्ति अहंकार की जरूरत है। वही जीव है ज्ञानोदय होने पर अहंकार को बोध होता है कि अहंकार का कारण ब्रह्म है। जीव अपना प्रारब्ध भोग कर प्रकृति से मुक्त हो जाता है।
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