माया ऐसा शब्द है जिसे बच्चा-बूढ़ा, छोटा-बड़ा, गरीब-अमीर सब कोई जानते हैं और जानने के बाद भी माया को कोई नहीं जानता है. कबीर भी कह गए 'माया महा ठगिनी हम जानी.' यह माया है क्या? इसका क्या अस्तित्व है? यह किस प्रकार संसार में व्याप्त है और किस प्रकार प्राणियों को माया व्याप्ती है? हम जितना भी इसके विषय में जानने की कोशिश करते हैं यह उतनी गहन हो जाती है. शंकराचार्य इसे अनिर्वचनीय कह गए हैं. इसको बताया नहीं जा सकता. यह सत्य भी नहीं है, यह असत्य भी नहीं है. यह सत और असत से मिलीजुली भी नहीं है. यह आत्मा से भिन्न नहीं है, अभिन्न नहीं है और उभयात्मिका भी नहीं है, यह अंग रहित भी नहीं है, अंग वाली भी नहीं है, यह उभयात्मिका भी नहीं है. यह अद्भुत है. यह होती भी है, यह नहीं भी होती है. यह दिखाई भी देती है और नहीं भी दिखाई देती है. इसको स्पष्ट करना निश्चय ही कठिन कार्य है. वेदों से लेकर भगवदगीता और तत्पश्चात शंकराचार्य और अनेक आचार्यों द्वारा माया को समझाने के लिए कुछ शब्दों का सहारा लिया है परंतु उनके भाष्यकार और आधुनिक विद्वान माया को स्पष्ट करते हुए भली-भांति नहीं समझने के कारण या माया के प्रभाव से माया को पूर्णतया स्पष्ट नहीं कर पाए हैं.
आइए प्रश्न और उत्तर के द्वारा माया के विषय को समझने का प्रयास करते हैं
1-प्रश्न -माया क्या है?
उत्तर- परमात्मा की प्राकट्य शक्ति या कहैं क्रियाशील शक्ति का नाम महामाया है.
2-प्रश्न- क्या परमात्मा की कोई अन्य शक्ति भी है?
उत्तर -हाँ उसका नाम प्रकृति है.
3-प्रश्न-प्रकृति और माया में क्या अंतर है?
उत्तर- प्रकृति अक्रिय तत्त्व है और माया क्रियाशील तत्त्व है. प्रकृति जब क्रिया शील हो जाती है तो उसका नाम माया हो जाता है जब तक वह शांत और अक्रिय है तब तक वह प्रकृति है.
4-प्रश्न- ब्रह्म या ईश्वर की प्रकृति होने पर वह उसको किस प्रकार व्याप्ती है? यह तो उचित नहीं लगता.
उत्तर-वह ब्रह्म या ईश्वर को व्याप्ती नहीं है न प्रभावित करती है.
5-प्रश्न -जीव या कहें प्राणी ब्रह्म का अंश है उसे तो व्याप्ती है?
उत्तर-यह भासित होता है. जीव इस माया का पति भी है और संतान भी है. है. ब्रह्म जब इस माया रुपी अविद्या के साथ भासित होता है तो जीव कहलाता है. यह व्यवहारिक सत्ता है.
6-प्रश्न- समझ में नहीं आया स्पष्ट करें. ऐसा क्यों होता है?
उत्तर-इस संसार में केवल एक सत्ता है वह आत्मा, परमात्मा या ब्रह्म नाम से जाना जाता है. वह एक है पर अलग अलग रूपों में दिखता है. छोटे से छोटे कीट से लेकर मनुष्य, देवता, ईश्वर, यहाँ तक की मिटटी, पत्थर, सूर्य, चंद्र, तारे, हवा,पानी, अग्नि, आकाश, विचार, क्रिया, उपकरण, भाग्य, प्रकृति, माया सभी कुछ वही है. कहने का तात्पर्य है जगत वास्तव में जो दिखाई देता है वह नहीं है. केवल एक सत्य और एक सत्ता आत्मा है. जगत वास्तव में जो दिखाई देता है वह वास्तविकता नहीं है. यही माया है.
7-प्रश्न- जगत वास्तव में जो दिखाई देता है वह नहीं है. क्या आप इसे प्रमाणित कर सकते है?
उत्तर- हाँ. ध्यान पूर्वक इस विषय को समझें. परमात्मा क्या है? पहले इसे समझें. जो सब कुछ है,पूर्ण है, जिसमें सब कुछ है वह परमात्मा है. कोई भी हो वह आप हों, धूल का कण हो, ईश्वर हो, परमात्मा हो, हर एक के अंदर उसकी शक्ति होती है जो उसमें निहित होती है. जब वह प्रकट होती है तो उसे माया कहते हैं. चूँकि परमात्मा पूर्ण हैं तो उसकी प्रकृति भी पूर्ण अर्थात सब कुछ होगी. इसलिए प्रकृति की क्रियाशील अवस्था माया भी पूर्ण शक्ति है. उसमें सब प्रकार की शुभ,अशुभ शक्ति है. वह कुछ भी कर सकने में समर्थ है.आप उसे अपनी बुद्धि की तरह समझें. जो आपको गिरा भी देती है और ऊँचा उठा भी देती है. यही आपको भ्रमित भी कर देती है.
इस महामाया के दो रूप हैं 1- योग माया २- माया 1-योग माया- जिससे यह संसार की वास्तविकता दिखाई देती है सत्य को जानने वाली बुद्धि है जिसे ऋतम्भरा कहते हैं, बोधमयी है, प्रज्ञावान है और विवेकमयी है. यह पूर्ण विशुद्ध रूप सत्य को जानने वाली बुद्धि है. इसे विद्या कहते हैं. 2-माया - जिससे संसार अलग अलग रूपों में भासित होता है. यह भी बुद्धि है. सामान्य भाषा में इसे मन कहते हैं. इसे अविद्या कहते हैं. इसकी दो शक्तियां प्रमुख हैं a-आवरण शक्ति b-विक्षेप शक्ति इसके अलावा यह सभी प्रकार की रचना कर सकती है. आवरण का सरल अर्थ है काला कम्बल. इसने सभी जीवों पर काला कम्बल डाल दिया है जिससे उनको वास्तविकता दिखाई नहीं देती.
पहले समझें जीव क्या है महामाया विद्या और अविद्या जब किसी जड़ या अक्रिय तत्त्व को स्वीकार कर लेती है या कहें माया जब मूल प्रकृति से मिल जाती है और उसमें ब्रह्म अहम् रूप में भासित होता है तो तो वह जीव हो जाता है. परमात्मा तो सर्वत्र है. वह तटस्थ है. अहम् रूप में, या स्वयं रूप में सबमें व्याप्त रहता है. आप अपने को लें.आप जो हैं आपका जो अहम् है वह तटस्थ है कांस्टेंट है. बुद्धि जो त्रिगुणात्मक है वह कार्य कर रही है वह योगमाया भी है और माया भी है. इस बुद्धि के ऊपर या जीव के ऊपर माया कम्बल डाल देती है. परमात्मा सर्वत्र है. इसलिए बुद्धि के साथ जब वह आकार ले लेता है तो जीव कहलाता है. यह ब्रह्म का प्रतिभासित स्वरुप है. इस माया की एक शक्ति और अद्भुत है जिसे विक्षेप शक्ति कहते हैं. यह जीव को या बुद्धि को उन्मत्त कर देती है. नशे में धुत्त मनुष्य की तरह बना देती है. इस कारण उसको सत्य नहीं दिखता. माया द्वारा शुद्ध बुद्धि के ऊपर काला कम्बल डाल दिया जाता है, ऊपर से दो बोतल शराब पिला दी जाती है.अब आकारीय बुद्धि या जीव अपने को भूल जाता है और यह माया उसे जैसा दिखाती है देखता है, यही माया है. परन्तु जिस पर काले कम्बल का असर न हो और शराबी की जैसी उन्मत्तता न चढ़े वह माया मुक्त हो जाता है तब वह ईश्वर कहलाता है. अब वह योगमाया से युक्त हो जाता है I माया जिसे अविद्या कहा गया है उसके आधीन हो जाती है.
एक बात महत्वपूर्ण है जब प्रकृति ईश्वरीय शक्ति माया के कारण आकार ले लेती है तब वह आकार शाश्वत हो जाता है. आकार सदा रहता है पर उसका स्वरुप बदलता रहता है. इसी को जीव या लिंग शरीर या बुद्धि देह कहते हैं. आकार भी परमात्मा का भासित स्वरुप है. सृष्टि में जो कुछ भी है वह परमात्मा का भासित स्वरुप है. उसे नाम और रूप में देखना माया है. नाम रूप से अलग हो जाना माया मुक्त होना है. यही ईशत्व है. परमात्मा या आत्मा न कहीं आता है न जाता है. वह सबके साथ होते हुए भी सबसे अलग रहता है. उस पूर्ण परमात्मा की प्रकृति माया शक्ति के कारण अनेक प्रकार के आकार लेती रहती है. उन आकारों को सत्य मान लेना माया है और उन आकारों में परमात्मा को देखना मुक्ति का मार्ग है. परमात्मा का बोध, अहम् सर्वत्र रहते हुए भी सब से अलग रहता है. वह सब जगह है और सबसे निर्लिप्त है. इस अहम् को भी समझें. यह आपके मैं का मैं है. इसको जानकार जो इसमें स्थित हो जाता है उसे माया नहीं व्याप्ती है क्योंकि यह मायाके अहम् का भी अहम् है. इससे आगे परमात्मा को नहीं जाना जा सकता है.
अब इस विषय को कुछ सामान्य बातों से समझते हैं. हम संसार को अपनी इन्द्रियों (senses )के माध्यम से समझते हैं. आपकी एक इंद्री कम या अधिक हो जाए तो आपके लिए इस जगत का रूप या किसी भी दूसरे का रूप बदल जाएगा. कीट जिस रूप में जगत को देखते हैं पशु उससे अलग इस जगत को देखते हैं, मनुष्य अपने तरीके से देखता है. मनुष्य में भी हिन्दू अपने को हिन्दू देखता है, मुसलमान अपने को मुसलमान, ईसाई अपने को ईसाई आदि. यही माया है.यदि हमारे एक दो Senses अधिक हो जायें तो यह जगत हमें कुछ अलग दिखेगा. यही माया है, एक को अलग अलग रूपों में देखना. वास्तविक रूप में एक परम सत है जिसे परमात्मा कहते हैं वही जगत में भिन्न भिन्न नाम रूप में भासित होता है. नाम रूप में देखना और उस नाम रूप को सत्य समझना माया है. आपका मन माया है जहाँ सदा संशय होता है. सत्य बुद्धि योगमाया है जो सदा यथार्थ देखती है और जानती है..
यहाँ यह जानना भी आवश्यक है कि किस प्रकार यह सृष्टि जन्मी.
1-परमात्मा और प्रकृति अभिन्नता - यह सब कुछ अवस्था है. यह पूर्णावस्था है. यहाँ परम बोध है,
2-अहम् - बोध का अहम् रूप में प्राकट्य,
3-अहम् का प्रकृति में स्फुरण - इसी को परा प्रकृति और अपरा (मूल )प्रकृति का संयोग जाना जाता है,
4-महामाया
5-महामाया की सृष्टि,
6-जीव का जन्म परन्तु अचर रूप में दृष्टिगोचर,
7-चर का प्राकट्य,
8-चर अचर का विकास कालांतर में मनुष्य तत्पश्चात देवत्व और ईश्वर.
परमात्मा के अहम् से प्रकृति में स्फुरण होता है यह अहम् परा प्रकृति है और मूल प्रकृति अपरा प्रकृति है. परा से संयोग होने मूल प्रकृति महामाया हो जाती है. महामाया का अर्थ है क्रियाशील प्रकृति परमात्मा के अहम् के साथ. यही जीव का कारण है. `