अहंकार को लेकर सारा संसार भ्रमित है और उसको भ्रमित आपकी पुस्तकों, धर्म ग्रंथों, दर्शनशास्त्र और शिक्षा ने किया है. कोई भी मनुष्य या कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसमें अहंकार न हो. यहां तक कि कोई भी जड़ वस्तु ऐसी नहीं है जहां अहंकार न हो परंतु आप अपने को निरंकारी कहलाना पसंद करते हैं. अहंकारी कोई आपसे कह दे तो आप लड़ने मरने मारने में उतारू हो जाते और कहलाना चाहते हैं निरंकारी. आइए अहंकार को समझते हैं. सृष्टि का परम कारण परमात्मा जिसे न कोई जानता है, न कोई जान पाया, न कोई जान पाएगा वह कैसा है? वह एक है, दो है, निराकार है, साकार है, किस रूप में है, कैसा है, कोई नहीं जानता परंतु दावा कर किया जाता है की वह एक है, कुछ कहते हैं वह दो है, कुछ कहते हैं वह निराकार है, कुछ कहते हैं वह साकार है परंतु कोई भी उसे आज तक नहीं जान पाया. परमात्मा की बात बहुत बड़ी है, उसकी मूल प्रकृति जो उसकी शक्ति है उसको भी कोई नहीं जानता. वह कैसी है? परमात्मा की उपस्थिति से मूल प्रकृति में जब गुण उत्पन्न होते हैं तब हम उसे त्रिगुणात्मक प्रकृति कहते हैं जो बुद्धि भी कहलाती है उसे अपना और दूसरे का ज्ञान होता है. त्रिगुणात्मक बुद्धि से पहले की अवस्था कोई भी नहीं जान सकता. न जान पाया इस बुद्धि के अनेक अंग हैं और यह बुद्धि भिन्न-भिन्न रूपों में भाषित होती है. इस विषय की चर्चा अहंकार को समझने के लिए आवश्यक है. अहंकार सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है जड़ - चेतन प्रत्येक
में अहंकार उपस्थित है, फिर हम कहते हैं हम अहंकारी नहीं हैं. इसे और गहराई से समझते हैं. परमात्मा और प्रकृति में उत्पन्न त्रिगुणात्मक प्रकृति तीन प्रकार की है सात्विक राजस और तामसी. यही हमारी बुद्धि है इसे हम जीव भी कहते हैं या जीव बुद्धि भी कह सकते हैं. जीव और बुद्धि अंतर मात्र यह है की अहम की उपस्थिति के कारण जीव को बुद्धि का कारक स्वीकार किया जाता है. अहंकार और अहम इन दोनों शब्दों को समझना आवश्यक है. अहम शब्द या अहम तत्व सृष्टि का प्रथम तत्व है यह पहली आस्था है जिसे हम सदा अनुभव करते हैं. इससे पहले मूल प्रकृति और परमात्मा को जाना नहीं जा सकता. यह अहम प्रकृति में आकार लेता है इसलिए अहंकार अहम + आकार = अहंकार है.. हर चीज का कोई आकार है और चाहे जड़ हो चाहे चेतन हो. प्रत्येक सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु में अहंकार है. अहम + आकार = परमात्मा + प्रकृति. अहम परमात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और आकार प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है. प्रश्न उठता है कि अहंकार को निंदनीय क्यों माना जाता
है असल में वैकारिक अहंकार निंदनीय है. वैकारिक
से तात्पर्य है जिसमें विकार हों. अहम जितना विकृति युक्त होता है जितना उसमें राग
द्वेष होता है, सुख-दुख की भावना होती है उतना वह आकार लेता जाता है इसलिए वैकारिक
अहंकार निंदनीय कहा गया है. इसी वैकारिक अहंकार
को जन सामान्य की भाषा में हम वैकारिक न जोड़कर केवल अहंकार कह देते हैं. परमात्मा
का अहंकार जो शुद्ध है वह तो शिव है वह सक्षात आपके अंदर अहम है, वही स्वयं के रूप
में आप में स्थापित है, वह सर्वत्र है. अहंकार, जितना अधिक मन के धरातल पर होता है उतना विकार युक्त होता है और जितना
अधिक बुद्धि के धरातल पर, बुद्धि के ऊपरी स्तरों पर होता है उतना अधिक शुद्ध होता जाता
है. उसमें स्वतः ही देवत्व आ जाता है. सामान्य बुद्धि से विवेक का धरातल श्रेष्ठ है,
विवेक से प्रज्ञा, प्रज्ञा से बोध, बोध से सत्य को ग्रहण करने वाली बुद्धि का धरातल
श्रेष्ठ है. जिस बुद्धि को हम ऋतंभरा कहते हैं जो सत्य को ग्रहण करती है इस स्थान पर
अहम साक्षात ईश्वर हो जाता है.
Wednesday, December 18, 2019
Monday, December 16, 2019
परमात्मा को जाना नहीं जा सकता उसकी प्राप्ति असंभव है.-108
प्रश्न- परमात्मा क्या है?
उत्तर-परमात्मा जो सबका
कारण है सनातन है. सनातन
का अर्थ है
जो पहले था,
आज है और
सदा रहेगा. इसे
ही कभी न
नाश होने वाला ब्रह्म
कहा गया है.
यह प्रकृति, पुरुष
और सृष्टि का
परम कारण है.
प्रश्न- क्या परमात्मा
की प्राप्त हो
सकती है? क्या
परमात्मा को जाना
जा सकता है?
उत्तर- परमात्मा को जाना
नहीं जा सकता
उसकी प्राप्ति असंभव
है. उसे आज
तक कोई नहीं
जान पाया न
जानता है. उसे
न देवता जानते
हैं न सिद्ध
जानते हैं न
संत जानते हैं
यहां तक कि
ईश्वर भी उसे
नहीं जानता है.
वेद भी उसे
नहीं जानते इसलिए
‘नेति नेति’ कहते
हैं. उसे वेद, भगवादगीता
आदि सभी प्रमाणिक
शास्त्र अव्यक्त कहते हैं.
अव्यक्त का अर्थ
है जिसे बताया
नहीं जा सकता,
कहा नहीं जा
सकता. वह अचिंत्य
है अर्थात जिस
का चिंतन नहीं
हो सकता फिर
भी उसे आप
जानना चाहते हैं
और आप के
आधुनिक गुरु उसे
जानने का दावा
करते हैं. परमात्मा
की बात छोड़िए
उसकी मूल प्रकृति
को भी कोई
नहीं जान सकता
न कोई जान
पाया. मूल प्रकृति
परमात्मा की उपस्थिति
से जब गुणों
के रूप में
प्रकट होती है
तो ही ज्ञानी
जन प्रकृति में
परमात्मा को जान
पाते हैं. इसलिए
नानक जी कहते
हैं ‘बलिहारी कुदरत
बसिया तेरा अंत
न जाने लखिआ’.
वेद कहते हैं
तू ही लाल
है, तू ही
पीला है, तू
ही हरा है,
तू ही नीला
है, तू ही
पक्षी है, तू
ही तितली है,
तू ही देव
है तू ही
दानव है, तू
ही मनुष्य है,
तू ही सब
कुछ है, तेरा
ही सब विस्तार
है.अब साधक
और ज्ञानी उसके
किसी एक अंश
को जानकर ही
कृतार्थ हो जाता
है. वह एक
है या अनेक
है? उसके बारे
में क्या कहा
जाए. कबीर कहते
हैं ‘मैं क्या
जानू राम को
नैनं कबहुँ न
दीठ’. उसको
कोई नहीं जानता.
हम सब भरमा
रहे हैं. इसलिए
अपना शोधन करना
आवश्यक है और
अपने शोधन से
ही उसके एक
सत्यांश को जाना
जा सकता है.
वह परमात्मा अपने
में पूर्ण है.
उस पूर्ण में
से आप कितना
ही निकाल दें
और उस पूर्ण
में आप कितना
ही जोड़ दें
वह सदा पूर्ण
रहता है इसलिए
उसकी प्राप्ति किसी
के लिए भी
संभव नहीं है
उसको जानना किसी
के लिए भी
संभव नहीं है.
हाँ उस के
एक अंश के
छोटे से हिस्से
के सत्यांश को
प्राप्त कर मनुष्य
या कोई जीव
कृतार्थ हो जाता
है.
प्रश्न- फिर मनुष्य
के लिए ज्ञेयं
क्या है?
उत्तर- स्वयं को जानना
ही मनुष्य का
परम ज्ञेयं है.
प्रश्न- स्वयं को जानने
से आपका क्या
तात्पर्य है?
उत्तर- क्या आप
शरीर हैं/ क्या
सूक्ष्म प्रकृति हैं? या
बुद्धि हैं ?क्या
चेतना हैं? क्या जीव
हैं? कहने का
तात्पर्य है आप
सबसे पहले क्या
थे. आप का
वास्तविक स्वरूप क्या था.
क्या स्वरूप वर्तमान
में है और
भविष्य में आप
का क्या स्वरूप
होगा.
प्रश्न- इसके लिए
क्या करना होगा?
उत्तर_ अपने मूल
को खोजना होगा.
पहले समझे आप
क्या है? आप
स्वयं का निरीक्षण
करें आप एक
विचार हैं या
कहैं विचारों का
समूह हैं . आपकी
जैसी बुद्धि है
आप वैसे हैं.
आप ही अहंकारी
हैं, आप ही
निरंकारी है, आप
ही बुद्धिमान हैं,
आप ही मूर्ख
हैं, जिस जीव
की जैसी बुद्धि
वह वैसा. श्री
भगवान भगवादगीता में
कहते हैं 'शृद्धामयो
अयं पुरुषो यो
यच्द्ध स एव
सः' ।17।3Iअर्थात जो जैसा
यह स्वयं है.
सबसे बड़ी कुंजी
बुद्धि है. बुद्धि
परमात्मा और मूल
प्रकृति जिसको कोई नहीं
जान सकता उसके
स्वरूप को, उनके
गुणों को प्रकट
करती है. कहीं
यह ज्ञानमयी है
तो कहीं अज्ञानमयी
है. कहीं है
सात्विक है, कहीं
राजस है तो
कहीं तमोगुणी. सामान्यतः
जीवों और मनुष्यों
में यह भिन्न-भिन्न मात्रा में
परिलक्षित होती है.
यहां मैं आपको
यह स्पष्ट कर
देना चाहता हूं,बुद्धि और इंटेलीजेंशिया
में अंतर. इंटेलीजेंशिया बुद्धि का एक
अंग है, जिसकी
जैसी बुद्धि उसमें
परमात्मा वैसा प्रगट
है.
प्रश्न- तो क्या
हमें अपनी बुद्धि
पर केंद्रित होना
चाहिए?
उत्तर- हां आपको
अपनी बुद्धि के
द्वारा बुद्धि का शोधन
करना है, विद्या
से अविद्या को
दूर करना, सतोगुण
से रज और
तम का
बाध करना है
तभी सात्विक बुद्धि
में परमात्मा का
सत प्रकट होता
है. इसलिए परमात्मा
को मत खोजो
अपनी बुद्धि का
शोधन करो. 'बुद्धि
युक्तो जहातीह उभे सुकृत
दुष्कृते' भगवादगीता
में अर्जुन को
दिया गया यही
परम कल्याणप्रद उपदेश
है। OM TAT SAT.
Wednesday, June 17, 2015
योग - 107-प्रो बसंत प्रभात जोशी
प्रश्न -योग क्या है?
उत्तर- चित्त वृत्तियों का निरोध योग है.
प्रश्न- क्या योग पूजा अथवा उपासना पद्धित है?.
उत्तर- हाँ. योग स्वरुप स्थिति (ईश्वर) की प्राप्ति के लिए किया जाता है. इसलिए योग की समस्त क्रियाएँ पूजा और उपासना पद्धित हैं. योगचित्तवृत्तिनिरोध .२. तदा दृष्टु स्वरूपे अवस्थानम् .(पातंजलि योग समाधिपाद)
नोट- यदि आप शरीर के लिए करते हैं तो यह कोई पूजा पद्धित नहीं है.
प्रश्न- योगासन क्या हैं?
उत्तर - योगासन चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए की जाने वाली साधना है.
योगासन शरीर के लिए नहीं है. यद्यपि योगासन करने से शरीर को भी फ़ायदा होता है. ध्यान रहे योगासन पीटी अथवा फिटनेस एक्सरसाइज नहीं है.
प्रश्न- योगासन से साधना में किस प्रकार लाभ होता है?
प्रश्न- योगासन मूलाधार से लेकर अनाहत चक्र तक भिन्न भिन्न ग्लैंड्स को नियमित करते हैं जिससे संकल्प विकल्प कम होने लगते हैं. मन का भागना कम होता जाता है.
प्रश्न- क्या योगासन करने का कोई ख़ास ढंग है?
उत्तर- हाँ. योगासन में दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है. १- श्वास २- किन आसनों से प्रारम्भ करना चाहिए.
प्रश्न-किन आसनों से प्रारम्भ करना चाहिए?
उत्तर - जो मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्रों में दबाव डाले. सरल शब्दों में सीने से लेकर जननेद्रियों पर दबाब डालने वाले आसन. इन आसनो के सिद्ध होने पर विशुद्ध चक्र पर दबाव डालने वाले आसन करने चाहिए. सरल शब्दों में गले में दबाब डालने वाले आसन.
प्रश्न- प्रमुख आसन कौन कौन हैं?
उत्तर- पश्चिमोपादातोसन, पाद उत्थान, भुजंगासन, धनुरासन और अर्ध मस्तेस्न्द्रियासन.
इनके सिद्ध होने पर मयूरासन
मयूरासन सिद्ध होने पर ही सर्वांगासन एवं हलासन किया जाता है.
सर्वांगासन एवं हलासन सिद्ध होने पर ही शीर्षासन का विधान है. शीर्षासन से सहस्त्रार और आज्ञाचक्र क्रियाशील होते हैं.
सिद्ध योगी ही इन सभी आसनों को तरीके से करा सकता है. विधान रहित होने पर यह योगासन मात्र शारीरिक क्रिया हैं.
प्रश्न- क्या योगासन अथवा आसान शरीर के लिए करने चाहिए?
उत्तर- अवश्य करने चाहिए. आजकल लोग यही कर रहे है. परन्तु सही मार्ग दर्शक से ही सीखिये.
उत्तर- चित्त वृत्तियों का निरोध योग है.
प्रश्न- क्या योग पूजा अथवा उपासना पद्धित है?.
उत्तर- हाँ. योग स्वरुप स्थिति (ईश्वर) की प्राप्ति के लिए किया जाता है. इसलिए योग की समस्त क्रियाएँ पूजा और उपासना पद्धित हैं. योगचित्तवृत्तिनिरोध .२. तदा दृष्टु स्वरूपे अवस्थानम् .(पातंजलि योग समाधिपाद)
नोट- यदि आप शरीर के लिए करते हैं तो यह कोई पूजा पद्धित नहीं है.
प्रश्न- योगासन क्या हैं?
उत्तर - योगासन चित्त की वृत्तियों को रोकने के लिए की जाने वाली साधना है.
योगासन शरीर के लिए नहीं है. यद्यपि योगासन करने से शरीर को भी फ़ायदा होता है. ध्यान रहे योगासन पीटी अथवा फिटनेस एक्सरसाइज नहीं है.
प्रश्न- योगासन से साधना में किस प्रकार लाभ होता है?
प्रश्न- योगासन मूलाधार से लेकर अनाहत चक्र तक भिन्न भिन्न ग्लैंड्स को नियमित करते हैं जिससे संकल्प विकल्प कम होने लगते हैं. मन का भागना कम होता जाता है.
प्रश्न- क्या योगासन करने का कोई ख़ास ढंग है?
उत्तर- हाँ. योगासन में दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है. १- श्वास २- किन आसनों से प्रारम्भ करना चाहिए.
प्रश्न-किन आसनों से प्रारम्भ करना चाहिए?
उत्तर - जो मूलाधार, स्वाधिष्ठान और मणिपुर चक्रों में दबाव डाले. सरल शब्दों में सीने से लेकर जननेद्रियों पर दबाब डालने वाले आसन. इन आसनो के सिद्ध होने पर विशुद्ध चक्र पर दबाव डालने वाले आसन करने चाहिए. सरल शब्दों में गले में दबाब डालने वाले आसन.
प्रश्न- प्रमुख आसन कौन कौन हैं?
उत्तर- पश्चिमोपादातोसन, पाद उत्थान, भुजंगासन, धनुरासन और अर्ध मस्तेस्न्द्रियासन.
इनके सिद्ध होने पर मयूरासन
मयूरासन सिद्ध होने पर ही सर्वांगासन एवं हलासन किया जाता है.
सर्वांगासन एवं हलासन सिद्ध होने पर ही शीर्षासन का विधान है. शीर्षासन से सहस्त्रार और आज्ञाचक्र क्रियाशील होते हैं.
सिद्ध योगी ही इन सभी आसनों को तरीके से करा सकता है. विधान रहित होने पर यह योगासन मात्र शारीरिक क्रिया हैं.
प्रश्न- क्या योगासन अथवा आसान शरीर के लिए करने चाहिए?
उत्तर- अवश्य करने चाहिए. आजकल लोग यही कर रहे है. परन्तु सही मार्ग दर्शक से ही सीखिये.
Friday, June 27, 2014
तेरी गीता मेरी गीता – 106 - बुद्ध - बसंत
आत्मा, परमात्मा, धर्म चर्चा पर उनका विशवास नहीं था. वह धर्म पालन पर जोर देते थे. साधना करते करते स्वयं सत्य अनुभूत करना उनका मार्ग था.
प्रश्न-बुद्ध और बौद्ध दर्शन के विषय में आप का क्या अभिमत है?
उत्तर- बुद्ध और बौद्ध दर्शन के विषय में आप क्या जानना चाहते हैं.
प्रश्न-क्या बुद्ध, भगवान अथवा परमात्मा को मानते थे?
उत्तर- बौद्ध दर्शन के अनुसार नहीं.
प्रश्न- क्या बुद्ध आत्मा को मानते थे?
उत्तर - बौद्ध दर्शन के अनुसार नहीं. बौद्ध दर्शन के अनुसार आत्मा के विषय में उनका मत अनात्मवाद कहलाता है. बौद्ध ग्रंथों में यह भी प्रसंग है कि जब उनसे पूछा गया क्या आत्मा है वह चुप रहे. फिर पूछा गया क्या आत्मा नहीं है वह फिर चुप रहे. फिर पूछा गया क्या आत्मा है भी और नहीं भी है. वह फिर भी चुप रहे.
प्रश्न- धर्म सिद्धांतों के विषय में आप क्या कहते हैं?
उत्तर- धर्म साधना हेतु बुद्ध ने सम्यक मार्ग दिया. इसे सम्यक अष्टांगिक मार्ग कहते हैं.
वह है सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाणी, सम्यक कर्म, सम्यक व्यायाम, सम्यक आजीवका सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि.
बौद्ध दर्शन इसे नया मार्ग कहता है. वास्तव में यह प्राचीन पद्धति है. बुद्ध से कई हजार वर्ष पूर्व भगवदगीता में श्री भगवान कृष्ण कहते है-
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः ।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ।16।
यह योग न बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल खाने वाले का तथा न बहुत शयन करने वाले का न अधिक जागने वाले का सिद्ध होता है। अर्थात सोना जागना, खाना पीना नियमित और सम्यक होना चाहिए तभी योग का अधिकारी होता है।
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ।17।
जिसका आहार विहार, चेष्टाएं, कर्म, जागना सोना सभी यथायोग्य अर्थात सम्यक हैं, ऐसे संयमित पुरुष का दुखों का नाश करने वाला योग सिद्ध होता है।
प्रश्न- क्या बुद्ध भगवान् थे?
उत्तर- बौद्ध दर्शन के अनुसार नहीं. हिन्दुओं के अनुसार भगवान् थे और हैं.
प्रश्न- आपके अनुसार क्या थे?
उत्तर- मेरे अभिमत में ज्ञानी मुक्त पुरुष थे जिसने अपनी वासनाओं को क्षय कर दिया था.
प्रश्न- क्या बुद्ध को बोध प्राप्त हुआ था?
उत्तर- बोध सभी मनुष्यों में होता है. अंतर केवल मात्रा का है. बुद्ध ने किस मात्रा में बोध प्राप्त किया यह वही अनुभव कर सकते हैं. यह गूंगे का गुड़ है.
प्रश्न- बुद्ध ने निर्वाण के विषय में क्या कहा था?
उत्तर- बुद्ध ने वास्तव में क्या कहा था यह तो बताया नहीं जा सकता परन्तु जैसा बौद्ध ग्रंथों में वर्णित है यदि वह निर्वाण है तो उसे प्राप्त करने से कोइ लाभ नहीं.
प्रश्न- ऐसा क्या लिखा है?
उत्तर- बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध आत्मा को नहीं मानते व परमात्मा को भी नहीं मानते. वह संस्कारी मनुष्य का जन्म और पुनर्जन्म मानते है.
निर्वाण प्राप्त व्यक्ति मृत्यु के बाद यदि संसार में विलीन हो जाता तो फिर इस निर्वाण से क्या लाभ.
ग्रन्थों में यह भी उल्लेख है कि निर्वाण प्राप्त मृत्यु के बाद शरीर में रहते हैं.
बुद्ध दर्शन चार तत्त्वों से बना शरीर मानता है जो मृत्यु के बाद नष्ट हो जाता है. चारों तत्त्व अपने अपने स्थान में विलीन हो जाते हैं. फिर किस शरीर में रहते हैं?
यह भी वृत्तांत है कि जब बुद्ध से पूछा गया म्रत्यु के बाद वह कहाँ रहंगे?
बुद्ध का ऊतर था मौन.
सारिपुत्र ने महाकाश्यप से पूछा. क्या तथागत मरणांतर रहते हैं?
बुद्ध ने यह व्याकृत नहीं किया
क्या तथागत मरणांतर नहीं रहते हैं?
बुद्ध ने यह भी व्याकृत नहीं किया
क्या तथागत मरणांतर रहते भी हैं और नहीं भी?
रहते हैं.
बुद्ध ने यह भी व्याकृत नहीं किया.
अंबेडकर बुद्ध दर्शन की व्याख्या करते हुए लिखते हैं.
परा प्राकृतिक में विश्वास अधर्म है.
ईश्वर में विश्वास अधर्म है.
आत्मा में विश्वास अधर्म है.
यज्ञं में विश्वास अधर्म है.
कल्पनाश्रित विश्वास अधर्म है.
धार्मिक पुस्तकों का वाचन अधर्म है.
धर्म की पुस्तकों को गलती से परे मानना अधर्म है.
प्रश्न – बुद्ध के विषय में आप अपना मत बताएं?
उत्तर-मेरा कहना है बौद्धों ने बुद्ध के साथ नाइंसाफी की है और उनके मार्ग को इस प्रकार रख दिया है कि लगता है बुद्ध चार्वाक, सांख्य दर्शन और वेदान्त का मिलाजुला रूप हैं. उनका अनात्मवाद चार्वाक दर्शन का प्रभाव है तो साधन मार्ग भगवद्गीता से प्रभावित है. वास्तविक सत्य यह है कि बुद्ध एक महान ज्ञानी पुरुष थे. वह साधना पर जोर देते थे. आत्मा, परमात्मा, धर्म चर्चा पर उनका विशवास नहीं था. वह धर्म पालन पर जोर देते थे. साधना करते करते स्वयं सत्य अनुभूत करना उनका मार्ग था. इसलिए किसी के द्वारा आत्मा, ईश्वर, निर्वाण म्रत्यु के बाद की स्थिति पर वह चुप हो जाते थे जिसे उनके अनुयाइयों ने गलत समझ लिया.
Friday, February 21, 2014
गीता- तेरी गीता मेरी गीता - 105 - समाधि - बसंत
प्रश्न- समाधि क्या है ? क्या यह प्राप्त की जा सकती है? इसके लक्षण क्या हैं?
उत्तर- समाधि दो शब्दों से मिलकर बना है सम और धी अर्थात बुद्धि का सम हो जाना. किसी भी जीव की बुद्धि तीन अवस्थाओं में रहती है १- क्रियाशील अवस्था २-सम अथवा स्थिर अवस्था ३- मृत अवस्था. सामान्यतः जीव में गर्भावस्था से ही बुद्धि क्रियाशील होती है और जीवन पर्यन्त रहती है. मृत्यु होते ही यह मृत हो जाती है.
इन दोनों के बीच की अवस्था है सम अथवा स्थिर बुद्धि. यह सतत साधना से प्राप्त की जा सकती है. पूर्ण स्थिर बुद्धि पूर्ण समाधि है . यदि बुद्धि स्थिर कम है तो बुद्धि की स्थिरता के आधार पर समाधि. यह समाधि भिन्न भिन्न साधकों में अलग अलग स्थिति की होती है. इसे मात्रात्मक समाधि कह सकते हैं. लगभग 50% बुद्धि स्थिर हो जाने पर साधक की स्वास गहरी और मंद हो जाती है. साधक आनंद में मगन रहता है. कोई दूसरा व्यक्ति साधक को हिलाकर, उसके कान में उसका नाम लेकर अथवा ॐ का उच्चारण कर उसे सामान्य स्थिति में ला सकता है. इसके बाद बुद्धि जितनी अधिक स्थिर होने लगती है स्वास उतना मंद हो जाता है और साधक उतना अधिक स्थिर और निश्चल हो जाता है.
पूर्ण समाधि में बुद्धि पूर्ण रूपेण रुक जाती है. साधक पूर्ण स्थिर और निश्चल हो जाता है. स्वास बंद हो जाती है. नाड़ी और ह्रदय की गति बंद हो जाती है. इस स्थिति में शरीर के सभी हिस्से जीवित और स्थिर रहते हैं. केवल वह अपना कार्य बंद कर देते हैं. शरीर के अंगों का क्षय नहीं होता. वह समाधि से पूर्व स्थिति की तरह स्थिर हालत में रहते हैं.
इसे हम गहरी नीद जिसे सुसुप्ति कहते हैं से समझ सकते हैं. सुसुप्ति में मस्तिष्क न क्रियाशील होता है न मृत होता है. इसी प्रकार पूर्ण समाधि में शरीर के सभी अंग न क्रियाशील होते हैं न मृत होते हैं. सभी अंग स्थिर दशा में रहते हैं.
पूर्ण समाधि दो प्रकार की होती है.संकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि. संकल्प समाधि में साधक अपने संकल्प के साथ पुनः चेतन और सक्रिय हो जाता है. निर्विकल्प समाधि.में साधक दूसरे के शास्त्र सम्मत प्रयासों द्वारा पुनः चेतन और सक्रिय होता है. इसमें मुख्यतः समाधिस्थ पुरुष को प्रार्थना द्वारा जगाने का प्रयास किया जाता है.
प्रश्न- समाधि से क्या लाभ हैं ?
उत्तर- समाधि की स्थिति के अनुसार साधक दिव्यता प्राप्त कर लेता है, उसका रूपांतरण हो जाता है, वह बोध स्वरुप हो जाता है. यदि समाधि के पश्चात उक्त स्थिति न दिखाई दे तो समझना चाहिए कि वह मात्र कोई शारीरिक क्रिया कर रहा था. इसे जड़ समाधि कहते हैं. यह एक प्रकार से नीद अथवा मूर्छा के सामान स्थिति है.
प्रश्न- नींद और समाधि में क्या अंतर है?
उत्तर- नीद, मूर्छा अथवा जड़ समाधि के बाद व्यक्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता है. वह जैसा कल था वैसा ही रहता है. क्रोधी व्यक्ति क्रोधी,लालची व्यक्ति लालची, कामी व्यक्ति कामी, सज्जन व्यक्ति सज्जन रहता है. उसकी बुद्धि में कोई परिवर्तन नहीं आता. वास्तविक समाधिस्थ पुरुष का समाधि की स्थिति के अनुसार रूपांतरण हो जाता है. पूर्ण समाधि प्राप्त व्यक्ति सृष्टि के सभी रहस्यों को जान लेता है. सभी तत्त्वों पर उसका अधिकार हो जाता है. उसका मस्तिष्क 100% क्रियाशील हो जाता है.
उत्तर- समाधि दो शब्दों से मिलकर बना है सम और धी अर्थात बुद्धि का सम हो जाना. किसी भी जीव की बुद्धि तीन अवस्थाओं में रहती है १- क्रियाशील अवस्था २-सम अथवा स्थिर अवस्था ३- मृत अवस्था. सामान्यतः जीव में गर्भावस्था से ही बुद्धि क्रियाशील होती है और जीवन पर्यन्त रहती है. मृत्यु होते ही यह मृत हो जाती है.
इन दोनों के बीच की अवस्था है सम अथवा स्थिर बुद्धि. यह सतत साधना से प्राप्त की जा सकती है. पूर्ण स्थिर बुद्धि पूर्ण समाधि है . यदि बुद्धि स्थिर कम है तो बुद्धि की स्थिरता के आधार पर समाधि. यह समाधि भिन्न भिन्न साधकों में अलग अलग स्थिति की होती है. इसे मात्रात्मक समाधि कह सकते हैं. लगभग 50% बुद्धि स्थिर हो जाने पर साधक की स्वास गहरी और मंद हो जाती है. साधक आनंद में मगन रहता है. कोई दूसरा व्यक्ति साधक को हिलाकर, उसके कान में उसका नाम लेकर अथवा ॐ का उच्चारण कर उसे सामान्य स्थिति में ला सकता है. इसके बाद बुद्धि जितनी अधिक स्थिर होने लगती है स्वास उतना मंद हो जाता है और साधक उतना अधिक स्थिर और निश्चल हो जाता है.
पूर्ण समाधि में बुद्धि पूर्ण रूपेण रुक जाती है. साधक पूर्ण स्थिर और निश्चल हो जाता है. स्वास बंद हो जाती है. नाड़ी और ह्रदय की गति बंद हो जाती है. इस स्थिति में शरीर के सभी हिस्से जीवित और स्थिर रहते हैं. केवल वह अपना कार्य बंद कर देते हैं. शरीर के अंगों का क्षय नहीं होता. वह समाधि से पूर्व स्थिति की तरह स्थिर हालत में रहते हैं.
इसे हम गहरी नीद जिसे सुसुप्ति कहते हैं से समझ सकते हैं. सुसुप्ति में मस्तिष्क न क्रियाशील होता है न मृत होता है. इसी प्रकार पूर्ण समाधि में शरीर के सभी अंग न क्रियाशील होते हैं न मृत होते हैं. सभी अंग स्थिर दशा में रहते हैं.
पूर्ण समाधि दो प्रकार की होती है.संकल्प समाधि और निर्विकल्प समाधि. संकल्प समाधि में साधक अपने संकल्प के साथ पुनः चेतन और सक्रिय हो जाता है. निर्विकल्प समाधि.में साधक दूसरे के शास्त्र सम्मत प्रयासों द्वारा पुनः चेतन और सक्रिय होता है. इसमें मुख्यतः समाधिस्थ पुरुष को प्रार्थना द्वारा जगाने का प्रयास किया जाता है.
प्रश्न- समाधि से क्या लाभ हैं ?
उत्तर- समाधि की स्थिति के अनुसार साधक दिव्यता प्राप्त कर लेता है, उसका रूपांतरण हो जाता है, वह बोध स्वरुप हो जाता है. यदि समाधि के पश्चात उक्त स्थिति न दिखाई दे तो समझना चाहिए कि वह मात्र कोई शारीरिक क्रिया कर रहा था. इसे जड़ समाधि कहते हैं. यह एक प्रकार से नीद अथवा मूर्छा के सामान स्थिति है.
प्रश्न- नींद और समाधि में क्या अंतर है?
उत्तर- नीद, मूर्छा अथवा जड़ समाधि के बाद व्यक्ति में कोई परिवर्तन नहीं होता है. वह जैसा कल था वैसा ही रहता है. क्रोधी व्यक्ति क्रोधी,लालची व्यक्ति लालची, कामी व्यक्ति कामी, सज्जन व्यक्ति सज्जन रहता है. उसकी बुद्धि में कोई परिवर्तन नहीं आता. वास्तविक समाधिस्थ पुरुष का समाधि की स्थिति के अनुसार रूपांतरण हो जाता है. पूर्ण समाधि प्राप्त व्यक्ति सृष्टि के सभी रहस्यों को जान लेता है. सभी तत्त्वों पर उसका अधिकार हो जाता है. उसका मस्तिष्क 100% क्रियाशील हो जाता है.
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प्रश्न- यह प्रकृति हमारे अन्दर किस रूप में रहती है और क्या क्या करती अथवा कर सकती है. इसकी महत्ता क्या है? क्या प्रकृति से परमात्मा को जा...
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प्रश्न- ज्ञान कैसे प्राप्त किया जाय? उत्तर- निरंतर चिंतन करना होगा कि तू शरीर नहीं है. तू न शरीर का कोई अंग है .शरीर का कोई तत्त्व भी तू...
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प्रश्न- कृपया एक लाइन में बताने का कष्ट करें कि ईश्वर क्या है? उत्तर- पूर्ण विशुद्ध ज्ञान जो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ करने में समर्थ ह...