अहंकार को लेकर सारा संसार भ्रमित है और उसको भ्रमित आपकी पुस्तकों, धर्म ग्रंथों, दर्शनशास्त्र और शिक्षा ने किया है. कोई भी मनुष्य या कोई भी प्राणी ऐसा नहीं है जिसमें अहंकार न हो. यहां तक कि कोई भी जड़ वस्तु ऐसी नहीं है जहां अहंकार न हो परंतु आप अपने को निरंकारी कहलाना पसंद करते हैं. अहंकारी कोई आपसे कह दे तो आप लड़ने मरने मारने में उतारू हो जाते और कहलाना चाहते हैं निरंकारी. आइए अहंकार को समझते हैं. सृष्टि का परम कारण परमात्मा जिसे न कोई जानता है, न कोई जान पाया, न कोई जान पाएगा वह कैसा है? वह एक है, दो है, निराकार है, साकार है, किस रूप में है, कैसा है, कोई नहीं जानता परंतु दावा कर किया जाता है की वह एक है, कुछ कहते हैं वह दो है, कुछ कहते हैं वह निराकार है, कुछ कहते हैं वह साकार है परंतु कोई भी उसे आज तक नहीं जान पाया. परमात्मा की बात बहुत बड़ी है, उसकी मूल प्रकृति जो उसकी शक्ति है उसको भी कोई नहीं जानता. वह कैसी है? परमात्मा की उपस्थिति से मूल प्रकृति में जब गुण उत्पन्न होते हैं तब हम उसे त्रिगुणात्मक प्रकृति कहते हैं जो बुद्धि भी कहलाती है उसे अपना और दूसरे का ज्ञान होता है. त्रिगुणात्मक बुद्धि से पहले की अवस्था कोई भी नहीं जान सकता. न जान पाया इस बुद्धि के अनेक अंग हैं और यह बुद्धि भिन्न-भिन्न रूपों में भाषित होती है. इस विषय की चर्चा अहंकार को समझने के लिए आवश्यक है. अहंकार सृष्टि में सर्वत्र व्याप्त है जड़ - चेतन प्रत्येक
में अहंकार उपस्थित है, फिर हम कहते हैं हम अहंकारी नहीं हैं. इसे और गहराई से समझते हैं. परमात्मा और प्रकृति में उत्पन्न त्रिगुणात्मक प्रकृति तीन प्रकार की है सात्विक राजस और तामसी. यही हमारी बुद्धि है इसे हम जीव भी कहते हैं या जीव बुद्धि भी कह सकते हैं. जीव और बुद्धि अंतर मात्र यह है की अहम की उपस्थिति के कारण जीव को बुद्धि का कारक स्वीकार किया जाता है. अहंकार और अहम इन दोनों शब्दों को समझना आवश्यक है. अहम शब्द या अहम तत्व सृष्टि का प्रथम तत्व है यह पहली आस्था है जिसे हम सदा अनुभव करते हैं. इससे पहले मूल प्रकृति और परमात्मा को जाना नहीं जा सकता. यह अहम प्रकृति में आकार लेता है इसलिए अहंकार अहम + आकार = अहंकार है.. हर चीज का कोई आकार है और चाहे जड़ हो चाहे चेतन हो. प्रत्येक सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु में अहंकार है. अहम + आकार = परमात्मा + प्रकृति. अहम परमात्मा का प्रतिनिधित्व करता है और आकार प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है. प्रश्न उठता है कि अहंकार को निंदनीय क्यों माना जाता
है असल में वैकारिक अहंकार निंदनीय है. वैकारिक
से तात्पर्य है जिसमें विकार हों. अहम जितना विकृति युक्त होता है जितना उसमें राग
द्वेष होता है, सुख-दुख की भावना होती है उतना वह आकार लेता जाता है इसलिए वैकारिक
अहंकार निंदनीय कहा गया है. इसी वैकारिक अहंकार
को जन सामान्य की भाषा में हम वैकारिक न जोड़कर केवल अहंकार कह देते हैं. परमात्मा
का अहंकार जो शुद्ध है वह तो शिव है वह सक्षात आपके अंदर अहम है, वही स्वयं के रूप
में आप में स्थापित है, वह सर्वत्र है. अहंकार, जितना अधिक मन के धरातल पर होता है उतना विकार युक्त होता है और जितना
अधिक बुद्धि के धरातल पर, बुद्धि के ऊपरी स्तरों पर होता है उतना अधिक शुद्ध होता जाता
है. उसमें स्वतः ही देवत्व आ जाता है. सामान्य बुद्धि से विवेक का धरातल श्रेष्ठ है,
विवेक से प्रज्ञा, प्रज्ञा से बोध, बोध से सत्य को ग्रहण करने वाली बुद्धि का धरातल
श्रेष्ठ है. जिस बुद्धि को हम ऋतंभरा कहते हैं जो सत्य को ग्रहण करती है इस स्थान पर
अहम साक्षात ईश्वर हो जाता है.
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