Tuesday, December 17, 2013
Tuesday, November 26, 2013
तेरी गीता मेरी गीता -धर्म जागृति क्या है?-104- बसंत
प्रश्न - धर्म जागृति क्या है?
उत्तर- मनुष्य जब यह विशवास करना प्रारम्भ कर देता है कि भगवान् है, परमात्मा है तब वह उसको पाने के लिए पागल हो जाता है.यह पागलपन धर्म जागृति है. इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है जब किसी व्यक्ति को यह विशवास हो जाता है कि मनुष्य से भी कोई उच्चतर जीवन है तो उस जीवन को पाने की छपटाहट धर्म जागृति है.
प्रश्न - धर्म जागृति से पूर्व कितनी कक्षाएँ हैं?
उत्तर- धर्म जागृति से पूर्व साधक की योगयता के अनुसार भिन्न भिन्न कक्षाएँ हैं जिनमें वह प्रवेश लेता है अथवा ले सकता है.
1-प्राइमरी कक्षा - १- कथा सुनना
२-मंदिर जाना
३-तीर्थ यात्रा करना
४-अनुष्ठान अथवा कर्मकांड
2-माध्यमिक कक्षा - १- देव यज्ञ- आरती, प्रार्थना, साधू-संत, गुरु, ईश्वर की उपासना २-ऋषि यज्ञ- धर्म शास्त्र सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन जैसे गीता, वेद, बाइबिल, ग्रन्थ साहिब, जैन, बोद्ध साहित्य आदि ३-पितृ यज्ञ - अपने माता पिता, पितरों, बड़ों के प्रति सम्मान और श्रद्धा ४- मनुष्य यज्ञ - अथिति सेवा और अपने से निर्बल मनुष्य की सहायता ५-भूत यज्ञ - पशु,पक्षियों, कीटों के प्रति कर्त्तव्य और करुणा, उनको भोजन देना आदि सेवा.
3-उच्च कक्षा - आहार- आपका भोजन जाति दोष, आश्रय दोष और निमित्त दोष से मुक्त हो. योगासन, नाड़ी शुद्धि, प्राणायाम,वाणी से जप करना.
4- उच्चतर कक्षा- १-यम- अहिंसा,सत्य,अस्तेय( किसी के हक़ को न चुराना अथवा छीनना),
२-नियम-पवित्रता- बाहरी और आतंरिक और संतोष. इस स्तर पर आतंरिक पवित्रता महत्वपूर्ण है.
३-प्रत्याहार- इंद्रियों के आहार को कम करना
४-धारणा- चित्त को एकाग्र करना
५-श्वास में नाम स्मरण
5-अति उच्चतर कक्षा- १-ध्यान, ध्यान धारणा की अगली स्थिति है.यहाँ बुद्धि निश्चिात्मक होने लगती है.
२-दृष्टा और साक्षी स्थिति. ३-मन से लगातार नाम स्मरण
परिणाम- धर्म, समाधि, स्वरुप स्थिति, ईश्वर प्रेम,मृत्युंजय, नियंता
उत्तर- मनुष्य जब यह विशवास करना प्रारम्भ कर देता है कि भगवान् है, परमात्मा है तब वह उसको पाने के लिए पागल हो जाता है.यह पागलपन धर्म जागृति है. इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है जब किसी व्यक्ति को यह विशवास हो जाता है कि मनुष्य से भी कोई उच्चतर जीवन है तो उस जीवन को पाने की छपटाहट धर्म जागृति है.
प्रश्न - धर्म जागृति से पूर्व कितनी कक्षाएँ हैं?
उत्तर- धर्म जागृति से पूर्व साधक की योगयता के अनुसार भिन्न भिन्न कक्षाएँ हैं जिनमें वह प्रवेश लेता है अथवा ले सकता है.
1-प्राइमरी कक्षा - १- कथा सुनना
२-मंदिर जाना
३-तीर्थ यात्रा करना
४-अनुष्ठान अथवा कर्मकांड
2-माध्यमिक कक्षा - १- देव यज्ञ- आरती, प्रार्थना, साधू-संत, गुरु, ईश्वर की उपासना २-ऋषि यज्ञ- धर्म शास्त्र सम्बन्धी पुस्तकों का अध्ययन जैसे गीता, वेद, बाइबिल, ग्रन्थ साहिब, जैन, बोद्ध साहित्य आदि ३-पितृ यज्ञ - अपने माता पिता, पितरों, बड़ों के प्रति सम्मान और श्रद्धा ४- मनुष्य यज्ञ - अथिति सेवा और अपने से निर्बल मनुष्य की सहायता ५-भूत यज्ञ - पशु,पक्षियों, कीटों के प्रति कर्त्तव्य और करुणा, उनको भोजन देना आदि सेवा.
3-उच्च कक्षा - आहार- आपका भोजन जाति दोष, आश्रय दोष और निमित्त दोष से मुक्त हो. योगासन, नाड़ी शुद्धि, प्राणायाम,वाणी से जप करना.
4- उच्चतर कक्षा- १-यम- अहिंसा,सत्य,अस्तेय( किसी के हक़ को न चुराना अथवा छीनना),
२-नियम-पवित्रता- बाहरी और आतंरिक और संतोष. इस स्तर पर आतंरिक पवित्रता महत्वपूर्ण है.
३-प्रत्याहार- इंद्रियों के आहार को कम करना
४-धारणा- चित्त को एकाग्र करना
५-श्वास में नाम स्मरण
5-अति उच्चतर कक्षा- १-ध्यान, ध्यान धारणा की अगली स्थिति है.यहाँ बुद्धि निश्चिात्मक होने लगती है.
२-दृष्टा और साक्षी स्थिति. ३-मन से लगातार नाम स्मरण
परिणाम- धर्म, समाधि, स्वरुप स्थिति, ईश्वर प्रेम,मृत्युंजय, नियंता
Monday, November 25, 2013
तेरी गीता मेरी गीता- धन्य हैं वे ?- 103 -बसंत
प्रश्न-धन्य कौन हैं?
उत्तर- 1.धन्य हैं वे जो बोध को प्राप्त हो गए हैं क्योंकि वे परमात्मस्वरूप हो गए हैं.
2.धन्य हैं वे जो बोधिसत्व हो गए हैं क्योंकि वे बोध को प्राप्त होंगें.
3.धन्य हैं वे जो आत्मरत हैं क्योंकि वे परम पद को पायंगे.
4.धन्य हैं वे जो स्वरुप अनुसंधान में लगे हैं वे स्वरुप अनुभूति को प्राप्त होंगें.
5.धन्य हैं वे जो प्रार्थना करते हैं क्योंकि उन पर कृपा की जायेगी.
6.धन्य हैं वे जिनका हृदय पवित्र हैं वह ईश्वर के दर्शन करेंगे.
7.धन्य हैं वे जो दया करते हैं क्योंकि उन पर दया की जायेगी.
8.धन्य हैं वे जो सत्य बोलते हैं क्योंकि वे सत स्वरुप को जानेंगें.
9.धन्य हैं वे जो अहिंसा को धारण करते हैं क्योंकि वह मृत्यु को जीत लेंगे.
10.धन्य हैं वे जो क्षमा करते हैं क्योंकि उनको क्षमा दी जायेगी.
11.धन्य हैं वे जो प्रेम करते हैं क्योंकि उनको प्रेम प्राप्त होगा.
12.धन्य हैं वे जो दूसरे के दुःख से दुखी होते हैं क्योंकि वे श्रेष्ठता को प्राप्त होंगे.
13.धन्य हैं वे जो परोपकार में रत हैं क्योंकि वे दिव्यता को प्राप्त होंगें.
14.धन्य हैं वे जो सत्य की खोज में लगे हैं क्योंकि वे सत्य को जानेंगे.
15. धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे ईश्वर को जानेंगें.
16.धन्य हैं वे जो निष्काम हैं क्योंकि वे संसार को जीतेंगे.
उत्तर- 1.धन्य हैं वे जो बोध को प्राप्त हो गए हैं क्योंकि वे परमात्मस्वरूप हो गए हैं.
2.धन्य हैं वे जो बोधिसत्व हो गए हैं क्योंकि वे बोध को प्राप्त होंगें.
3.धन्य हैं वे जो आत्मरत हैं क्योंकि वे परम पद को पायंगे.
4.धन्य हैं वे जो स्वरुप अनुसंधान में लगे हैं वे स्वरुप अनुभूति को प्राप्त होंगें.
5.धन्य हैं वे जो प्रार्थना करते हैं क्योंकि उन पर कृपा की जायेगी.
6.धन्य हैं वे जिनका हृदय पवित्र हैं वह ईश्वर के दर्शन करेंगे.
7.धन्य हैं वे जो दया करते हैं क्योंकि उन पर दया की जायेगी.
8.धन्य हैं वे जो सत्य बोलते हैं क्योंकि वे सत स्वरुप को जानेंगें.
9.धन्य हैं वे जो अहिंसा को धारण करते हैं क्योंकि वह मृत्यु को जीत लेंगे.
10.धन्य हैं वे जो क्षमा करते हैं क्योंकि उनको क्षमा दी जायेगी.
11.धन्य हैं वे जो प्रेम करते हैं क्योंकि उनको प्रेम प्राप्त होगा.
12.धन्य हैं वे जो दूसरे के दुःख से दुखी होते हैं क्योंकि वे श्रेष्ठता को प्राप्त होंगे.
13.धन्य हैं वे जो परोपकार में रत हैं क्योंकि वे दिव्यता को प्राप्त होंगें.
14.धन्य हैं वे जो सत्य की खोज में लगे हैं क्योंकि वे सत्य को जानेंगे.
15. धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे ईश्वर को जानेंगें.
16.धन्य हैं वे जो निष्काम हैं क्योंकि वे संसार को जीतेंगे.
Friday, November 22, 2013
Teri Gita/तेरी गीता मेरी गीता – धर्म - अपने वास्तविक स्वरुप को जानने का साधन -102 - बसंत
आप सब लोग धर्म
को माननेवाले हैं परन्तु धर्म मानने की बात नहीं है धर्म जीने का तरीका है जैसे
सत्य बोलना धर्म है, यह सब मानते और जानते हैं पर सत्य को जीवन में नहीं उतारते
हैं. जैसा कि आपको पहले भी सुस्पष्ट किया गया है आपका स्वभाव आपका धर्म है यही
नहीं आप स्वयं धर्म हो परन्तु आप धर्म को अपने से बाहर खोजते हो. आप अच्छे हैं
अथवा बुरे आपका धर्म जो स्वयं आप हो सदा आपके साथ रहता है. बिना धर्म के आपका कोई
अस्तित्व ही नहीं है. दूसरे का बताया
कोई भी रास्ता यदि आपके स्वभाव के अनुकूल होता है तभी आप उससे सहमत होते हैं, उसका अनुसरण करते हैं. मूल बात यह है हम
सब दिव्यता चाहते हैं, श्रेष्ठता चाहते
हैं और इसके लिए अपने को समझना और जानना आवश्यक है. यदि आप में अपने को जानने की
समझ नहीं है तो आप कभी भी धर्म का आचरण नहीं कर सकते हैं.
आप सभी ने रावण
का नाम सुना है, बड़ा प्रतापी राक्षस
था जिसने तीनो लोक जीत लिए थे. ऋषि पुलत्स्य के कुल में उत्पन्न रावण चारों वेदों
का पंडित होने के कारण धर्म को अवश्य ही जानता था परन्तु स्वयं के जीवन में उसका
आचरण नहीं था, स्वयं के जीवन में धर्म नहीं था.
‘तामस तन कछु
साधन नाहीं’
कहने का तात्पर्य
यह है यदि आप विद्वान हैं बहुत कुछ जानते हैं पर जीवन में धर्म साधन नहीं है तो सब
कुछ निरर्थक है. धर्म कहने की वस्तु नहीं है, धर्म तो जीना पड़ता है. आप यदि धर्म
अर्थात अपने वास्तविक स्वरुप को जानने का साधन करते हैं तो आप धर्म को जानते हैं.
अतः स्पष्ट है स्वयं
को (अपनी आत्मा) को जानने का प्रयत्न धर्म साधन है और स्वरुप स्थिति इसका
पूर्णत्व है.
. .
Thursday, October 3, 2013
तेरी गीता मेरी गीता - त्रिदेव का रहस्य -101 - बसंत
प्रश्न - परमात्मा के त्रिदेव रहस्य को एक बार फिर से समझाने का कष्ट करें?
\उत्तर- आपसे इस विषय में कई बार चर्चा हुई है, इस विषय को ध्यान पूर्वक फिर से सुनिए. परमात्मा जो विशुद्ध ज्ञानस्वरुप है वह और उसकी शक्ति जिसे माया कहा जाता है उसी प्रकार अभिन्न हैं जिस प्रकार आप और आप की शक्ति. ब्रह्म की शक्ति के तीन स्वरुप हैं ज्ञान शक्ति जो शुद्ध मैं है, अज्ञान शक्ति जो जड़ है और इन दोनों को जोड़ने वाली, सतत गतिमान क्रिया शक्ति है. शुद्ध मैं को ही विराट ईश्वर, नारायण अथवा श्री हरि विष्णु कहा जाता है. अज्ञान को महादेव शंकर और क्रिया को ब्रह्मा जी कहा गया है. यह तीनों ब्रह्म शक्ति के तीन स्वरुप हैं इसलिए सदा परमात्म स्वरुप हैं.
इन तीन शक्तियों की भिन्न भिन्न मात्रा के मिलने से देव,यक्ष.गंधर्व,अप्सरा,राक्षस,पिशाच,भूत ,प्रेत, मनुष्य और पशु.पक्षी,कीट, वनस्पति. खनिज, पत्थर आदि भिन्न भिन्न योनियों का सृजन होता है.
एक बड़ा विवाद है कोई कहते हैं महादेव शंकर सर्व श्रेष्ठ हैं वही आदि देव हैं कोई श्री हरि विष्णु को सर्व श्रेष्ठ कहते हैं उन्हीं को आदि देव मानते हैं. इस विषय में भी निश्चित मत सुन लीजिये. जो जैसा होता है उसकी मूल शक्ति भी उसी की भांति होती है.परमात्मा जो विशुद्ध ज्ञान स्स्वरूप है उनकी ज्ञान शक्ति ही मूल शक्ति है जिसका प्रतिनिधत्व श्री हरि विष्णु करते हैं. दूसरा ज्ञान ही अज्ञान में बदल सकता है और बदलता है. अज्ञान ज्ञान के बिना ज्ञान में नहीं बदल सकता. क्रिया स्वाभाविक है, ज्ञान और अज्ञान के प्रतिनिधि श्री हरि विष्णु और महादेव हैं. शाक्तों ने इसे भगवती के तीन रूपों से जोड़ दिया, उद्भव, स्तिथ, संहारकारिणी. सब कुछ एक ही है. एक ही देव सब में भिन्न भिन्न रूप में परिलक्षित होता है. परन्तु उपलब्धि का विषय ज्ञान है, शुद्ध मैं है जो नारायण है. नारायण ही शिव हैं वही ब्रह्माजी के पिता हैं. वही विराट पुरुष हैं.
Friday, September 6, 2013
तेरी गीता मेरी गीता / TERI GITA MERI GITA - मैं – 100 - बसंत
शून्य परे ही मैं सदा
मैं ही विश्व परिपूर्ण
आदि देव सब देव का
स्वयं सदा परिपूर्ण
मैं अविनाशी नित्य निरंजन
एक अखंड समर्थ जनार्दन
खुद ही उपजा खुद उपजाया
मैं से मैं का लघुतर रूप
मैं अनंत तो सीमित हूँ मैं
सब ही हैं मैं के प्रतिरूप
मैं ही बंधता मुक्त सदा मैं
मुक्ति बंध से सदा विमुक्त
मैं अज्ञान ज्ञान भी मैं
हूँ
मैं ही जीवन मैं ही मृत्यु
भिन्न भिन्न जीवन के पहलू
सब होते मैं से परिपूर्ण.
Thursday, August 15, 2013
तेरी गीता मेरी गीता – पाप पुण्य - 99 - बसंत
प्रश्न- संसार में कई लोग
पाप करते हैं परन्तु मजे करते दिखाई देते हैं और कई भले लोग अच्छाई करते हुए भी
परेशान होते हैं, कष्ट पाते हैं ऐसा क्यों होता है?
उत्तर- यह संसार है, यहाँ कोई
सुखी है तो कोई दुखी, कोई आज सुखी है तो भविष्य में दुखी इसी प्रकार कोई आज दुखी
है तो कल सुखी दिखाई देता है. इस प्रकार भिन्न भिन्न सुख दुःख स्थितियों से गुजरते
प्राणी हम सदा देखते आये हैं. प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों होता है? इस संसार में जो
भी देने वाला है वह हमारा कर्म है. हमने जो पहिले किया है जो आज कर रहे हैं सब
उसका ही परिणाम है. जन्म जन्मान्तरों में जो कर्म किये हैं उसके कारण मुख्य रूप से
छः प्रकार के मनुष्य दिखाई देते हैं.
१ 1- घोर पापी- पूर्व जन्मों के पाप
किये हुए केवल पाप भोगते हैं – यह जन्म से ही बीमार, असाध्य रोगों से पीड़ित, अंग भंग
हुए क्षीण आयु होते हैं.
2 2- पापी- पूर्व जन्मों के पाप किये
हुए केवल पाप करते हैं और पाप भोगते हैं.
3 3- पुण्य क्षयी - पूर्व जन्मों
के पाप पुण्य को लिए हुए पाप करते हैं पुण्य भोगते हैं. इस प्रकार पुण्य क्षय करते
हैं. वर्तमान युग में इस प्रकार के मनुष्यों का बोलबाला अधिक है.
4 4- पाप पुण्य रता- पूर्व
जन्मों के पाप पुण्य को लिए हुए पाप, पुण्य करते हैं और पाप पुण्य भोगते हैं. समाज
में यह भी अधिक संख्या में होते हैं.
5- पाप क्षयी पुण्यात्मा - पूर्व
जन्मों के पाप पुण्य को लिए हुए पुण्य करते हैं पाप भोगते हैं. यह अपने आदर्शों से
समझोता न करने वाले, इमानदार, समाज की भलाई के लिए प्रताड़ित होते हैं. इन पर आरोप
भी लगते हैं परन्तु यह विकास की उच्च अवस्था के लोग हैं.
6- पुण्यात्मा- पूर्व जन्मों
के पुण्य को लिए हुए पुण्य करते हैं और पुण्य भोगते हैं. श्रेष्ट महापुरुष इस
श्रेणी में आते हैं. संसार में इस प्रकार का जन्म दुर्लभ है.
इन छ प्रकार के मनुष्यों के
अलावा सौ दो सौ करोड़ों में कभी कोई निष्काम कर्म योगी भी मिलता है जो पुण्यात्मा
पुरुष की अगली अवस्था है. कभी कभी जन्म से ही नित्य सिद्ध निष्काम कर्म योगी अवतारी
पुरुष भी मिलते हैं.
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