प्रश्न - हम जब ईश्वर के अंश हैं तो फिर इतने अपूर्ण, इतने हताश और निराश क्यों हैं. हमारी ईश्वरी शक्तियां क्यों नहीं प्रकट होती हैं.
उत्तर- हम ज्ञान के दो तत्त्व ज्ञान और अज्ञान से मिलकर बने हैं. यह तत्त्व चैतन्य और जड़ के रूप में आभासित और दिखाई देते हैं. चैतन्य के हाथ पाँव नहीं हैं और जड़ की आँखें या महसूस करने की शक्ति नहीं है, वह बिना शक्ति का है. उसे ज्ञान की चैतन्य शक्ति चाहिए तभी वह हिलडुल सकता है अथवा कार्य कर सकता है. जब इन दोनों का मिलन होता है तो जड़, चैतन्य के कारण चेतन हो जाता है.यह चेतन लगभग चैतन्य की तरह होता है पर यह वास्तविक नहीं है इसलिए शक्ति में सीमित और सीमाओं में बंधा होता है.यही नहीं यह अपनी शक्ति से अपना संसार स्थापित कर लेता है. अब जो परम शक्तिमान चैतन्य है वह खेल देखता है और आप अपनी चेतना में मगन हो जाते हैं आपकी चेतना आपका अहंकार बन जाती है, आपकी प्रकृति के अनुसार आपकी बुद्धि बन जाती है. मन का खेल शुरू हो जाता है. अब आप का अपना स्वरुप जो वास्तविक है ही नहीं उसमें वास्तविक की शक्तियां कहाँ और कैसे आयेंगी.
यदि आप इस खेल को कायदे से समझ गए तो आप मुस्कुराने लगते हो पर अब भी वास्तविकता से कोसों दूर हो. आपको बुद्धि से नहीं यथार्थ में इस रहस्य को अनुभूत करना होगा. बोध होने पर जब जड़ का चैतन्य के साथ सीधा कनेक्सन (सम्बन्ध) हो जाता है तो आपकी चेतना, आपके अहंकार के लिए कोइ स्थान नहीं रहता. चैतन्य के साथ सीधा कनेक्सन (सम्बन्ध) होते ही आपकी बुद्धि, आपका शरीर अप्रमित बलशाली और दिव्य विभूतियों से युक्त हो जाता है. वास्तव में ईश्वर आप में अंश के रूप में नहीं बल्कि पूर्ण रूप में अपनी दिव्यताओं के साथ विद्यमान है. परन्तु आपकी प्रकृति जो जड़ है उसके साथ उसका सम्बन्ध कटा हुआ है और आप नकली जड़ से उत्पन्न चेतना को असली मानकर इसके संसार में जी रहे हो.
इसे आप इस प्रकार समझसकते हैं सूर्य ज्ञान है, चैतन्य है और पृथ्वी जड़ है. सूर्य प्रकाश जो प्रथ्वी तक आता है वह पृथ्वी तक पहुँचते पहुँचते 1/२अरबवें हिस्से का 52% रह जाता है. इसी पकार तुम में से किसी किसी को वास्तविक चैतन्य का कभी कभी अहसास इतना ही हो पाता है. जिस प्रकार सूर्य के उदय से अस्त और अस्त से उदय होने तक पृथ्वी के वायु, जल, थल मंडल में निरंतर गतिविधियाँ चलती रहती हैं उसी प्रकार तुम्हारे अन्दर भी अहंकार ,बुद्धि, मन के ज्वार उठते रहते है. तुम सदा अहंकार ,बुद्धि, मन के उठते ज्वार में खोये रहते हो. तब चैतन्य बोध कैसे होगा. तुमको अपनी चेतना के धरातल से ऊपर उठना पड़ेगा. तुम्हारी चेतना तुम्हारी प्रकृति की विकृति है. तुमको पूर्ण होने के लिए चैतन्य होना होगा जो विशुद्ध और पूर्ण ज्ञान स्वरुप है, जिसमें सभी दिव्यता हैं जहाँ कोई निराशा नहीं है, सभी शक्तिया है परम शान्ति और आनंद है.
No comments:
Post a Comment