Wednesday, October 26, 2011

वेदान्त-सरल वेदान्त –अध्याय-1- ईश्वर- प्रो बसन्त



ईश्वर निराकार है. उसे यथार्थ में पूर्ण रूप से व्यक्त कर पाना संभव नहीं है. इस कारण ईश्वर अव्यक्त कहा जाता है.
ईश्वर का ईश्वर वही
सकल देव के देव
पतियों के वह परमपति
ब्रह्म अंड के स्वामि
वह स्तुति के योग्य है
परम परे है जान.७.-६-
                        श्वेताश्वतरोपनिषद्


यह मानना कि ईश्वर ने जगत अथवा सृष्टि का निर्माण किया है पहले दर्जे की मूर्खता है. वास्तव में जगत ईश्वर का विस्तार है जैसे बीज और वृक्ष. शुक्राणु और शरीर, डी एन ए और शरीर. इसी प्रकार शरीर और बाल, शरीर और नाखून. वृक्ष और पत्ते, वृक्ष और फल. जगत ईश्वर का सगुण स्वरूप है. 

धरा पुष्ट हो खुद उगें
जैसे पादप भिन्न
रोम प्रकट जिमि पुरुष में
विश्व प्रकट परब्रह्म.७-१-
                         मुंडकोपनिषद्  

अक्षर है वह सत्य है
ब्रह्म बीज सब भूत
चिनगी निकलें अग्नि से
जीव जगत तस ब्रह्म
भाव प्रकट परब्रह्म से
ओर उसी में लीन .१. -२-
                       मुंडको पनिषद्



ॐ अक्षर ब्रह्म है
जगत है प्राकट्य
भूत भवि भव ॐकार है
काल परे भी सोहि.१.
                       मांडूक्योपनिषद्




अवर्ण है निहितार्थ वह
अनेक वर्ण धारता
शक्ति योग आदि से
सृष्टि आदि में प्रकट
अन्त में विलीन जग
एक है देव वह
योग युक्त कर सदा
शुद्ध बुद्धि दे  सकल.१-४-
                         श्वेताश्वतरोपनिषद्

तू नर है तू नारि तू
तू कुमार कुमारी
वृद्ध हो तू चले दण्ड संग
तू विराट तू विश्व मुख.३-४-
                            श्वेताश्वतरोपनिषद्




नील वर्ण कीट है
लाल हरित पक्षी भी
मेघ है ऋतु सभी
सप्त सागर तू हि है
विश्व भूत तुझसे हैं
आदि विभु वर्तमान.४-४-
                        श्वेताश्वतरोपनिषद्

योनि योनी में पैठ एक
जगत लीन जेहि जात
रूप प्रकट बहु आदि में
ईश वरद परदेव
ईश जान निश्चय परम
परम शान्ति को प्राप्त.११-४-
                            श्वेताश्वतरोपनिषद्
एक अकेला बहुत से
शासक निष्क्रिय तत्व
एक बीज बहु रूप प्रकट हो
धीर आत्म में देख .१२.-६-
                       श्वेताश्वतरोपनिषद्
भगवद गीता के दसवें अध्याय में श्री भगवान कहते हैं-

सकल भूत का बीज मैं और बीज का बीज
पार्थ, चराचर भूत नहिं जो मुझसे हो रिक्त।। 39।।

हे अर्जुन, सब भूतों की उत्पत्ति का कारण मैं ही हूँ अर्थात मैं बीजप्रद पिता हूँ जो इस प्रकृति में गर्भ स्थापित करता है, इस संसार में चर अचर कोई भी ऐसा नहीं है जिसमें मैं नहीं हूँ और वह मुझमें नहीं है, मैं आत्मरूप में सृष्टि के प्रत्येक परमाणु में स्थित हूँ। सृष्टि की कोई वस्तु कोई स्थान ऐसा नहीं है जहाँ आत्मतत्व का विस्तार, आत्मतत्व (विशुद्ध ज्ञान) की उपस्थिति न हो।

मेरी दिव्य विभूति का, अन्त नहीं है पार्थ
तेरे से संक्षेप में कहा विभूति विस्तार ।। 40।।

हे अर्जुन, मेरे योग ऐश्वर्य और विभूति का कोई अन्त नहीं है, मेंने अपने दिव्य विभूतियों को बहुत संक्षेप में तेरे लिए कहा है।

जो जो वस्तु विभूतिमय, शक्ति कान्तिमय पार्थ
अल्प अंश मम तेज से, उसका उद्भव जान।। 41।।

हे अर्जुन तू यह जान ले कि इस सृष्टि में जो भी विभूति युक्त, कान्ति युक्त और शक्ति युक्त वस्तु है वह सब मेरे आत्म तेज के एक अंश की अभिव्यक्ति है अर्थात परमात्मा के एक अंश मात्र ने सृष्टि के कण कण को व्याप्त किया हुआ है, सृष्टि का प्रत्येक कण परमात्मा को भासित करता है।

क्या करेगा जानकर, बहुत जानकर बात
स्थित मैं धारण जगत, एक अंश सुन पार्थ।। 42।।

श्री भगवान कहते हैं मेरी विभूतियों का अन्त नहीं है, मुझ अव्यक्त परमात्मा के एक अंश परा प्रकृति ने सम्पूर्ण जगत को धारण किया है। विश्व के कण कण में मैं आत्म रूप में स्थित हूँ, सभी विभूति मेरा ही विस्तार हैं। चर अचर में मैं ही व्याप्त हूँ। सबका कारण भी मैं ही परमात्मा हूँ।

भगवदगीता का पन्द्रहवाँ अध्याय अश्वथ योग भी इसी की पुष्टि करता है.

अविनाशी अश्वत्थ यह नीचे शाखा ऊपर मूल
छंद इसके पर्ण हैं, जाने विज्ञ विभेद।। 1।।

श्री भगवान अर्जुन को सृष्टि का रहस्य बताते हुए कहते हैं; इस सृष्टि का जो मूल है वह परब्रह्म परमात्मा मूल से भी ऊपर है अर्थात जहाँ से सृष्टि जन्मी है परमात्मा उससे परे है और माया जिसे अज्ञान कहा है इस सृष्टि का मूल है। उस मूल से परे ब्रह्म से यह अश्वत्थ वृक्ष पैदा होता है। माया इस वृक्ष का मूल है, इस वृक्ष का फैलाव ऊपर से नीचे की ओर है। माया (अज्ञान) उस अव्यक्त (ज्ञान) को आच्छादित कर सुला देती है। फिर उस
माया में अव्यक्त के बीज से माया का अंकुर फूटता है। परम शुद्ध ज्ञान को अज्ञान (माया) क्रमशः अधिक-अधिक आवृत्त करते जाता है। यही अश्वत्थ वृक्ष की ऊपर से नीचे की ओर फैलने की गति है। यह माया का वृक्ष भी अविनाशी है। वेद छन्द इसके पत्ते हैं अर्थात वेद भी माया के पार नहीं जा पाते हैं, अज्ञान से प्रभावित होने के कारण उनकी पहुंच सीमित है। जो मनुष्य इस अश्वत्थ वृक्ष को तत्व से जानता है वही यथार्थ ज्ञानी है।

जगत ईश्वर का विस्तार है जेसे बीज और वृक्ष पर  यदि कोई मनुष्य जगत को पाकर यह सोच ले कि उसने ईश्वर को पा लिया है तो यह सोच उसी प्रकार की  होगी कि नाखून को पाल कर, उनकी देख भाल कर व्यक्ति यह मान ले कि उसने शरीर की देख भाल कर ली है शरीर का पालन कर लिया है. जगत से ईश्वर को समझा जा सकता है, पाया भी जा सकता है ठीक उसी प्रकार जैसे नाखून के एक सूक्ष्म अंश डी एन ए से शरीर. इस हेतु सम्पूर्ण प्रक्रिया से गुजरना होगा तभी सत्य की उपलब्धि होगी. जगत से ईश्वर को जानने के लिए सम्पूर्ण जगत को जानना होगा. जगत संरचना के सूक्ष्म से सूक्ष्म तत्त्व को जानना होगा.

सबका कारण परमात्मा  होने से उसे जगत का निर्माण करने वाला मान लिया जाता है. बीज जेसे स्वाभविक रूप से वृक्ष बनता है उसी प्रकार परमात्मा से विश्व प्रकट होता है.

ईश्वर का साकार स्वरूप
ईश्वर का साकार स्वरूप ईश्वर का विस्तार जगत है पर यथार्थ में इसकी कोई सत्ता नहीं है क्योंकि  परमात्मा से जगत पृथक नहीं है.
ईश्वर का साकार स्वरूप-
सत् रज तम (महत् )
अहँकार
बुद्धि
मन
शब्द
स्पर्श
प्रभा
रस
गंध
आकाश
वायु
अग्नि
जल
पृथ्वी

इन सबका मिला जुला पूर्ण चैतन्य शुद्ध स्वरूप ईश्वर का साकार स्वरूप है. जहाँ सत् रज तम ( महत् ) उसकी ज्ञान शक्ति के आधीन है.जब ज्ञान शक्ति इनके आधीन हो जाती है तो  ईश्वर जीव हो जाता है. जितना आधीन उतना निम्न स्तर और जितना मुक्त उतना उच्च स्तर जिस मानवीय  शरीर में महा बुद्धि ( पूर्ण शुद्ध ज्ञान ) INTELLIGENCE OF HIGHEST ORDER, ABOLUTE WISDOM AND KNOWLEDGE हो वह साकार  ईश्वर  होता है जिसे अवतार कहते हैं. श्री कृष्ण, श्री राम ऐसे ही  स्वरूप थे. इस विषय में महात्मा ईसा का कथन Me and my Father are one. उल्लेखनीय है.

ॐतत् सत् 
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Sunday, October 23, 2011

उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् - छठा अध्याय - बसन्त


श्वेताश्वतरोपनिषद् 
                  Author of Hindi verse –Prof Basant

     छठा अध्याय


स्वभाव कारण जगत का
काल कारण अन्य
मोह ग्रस्त जानत नहीं
परम देव सब लोक
ब्रह्म चक्र है घूमता
जिस महिमा से नित्य.१.


सदा व्याप्त जग देव है
ज्ञान रूप मह काल
सर्वगुणा सर्ववित वही
शासित हैं सब कर्म
भू जल अनल वायु खम्
नित शासित हैं चिन्त्य.२.


उसने रचा कर्म को
फिर निरीक्ष कर जान
जड़ चेतन का योग कर
एक दो त्रय से अष्ट
और काल गुण आत्म से
जीव योग कर सृष्टि.३.


व्याप्त गुणों से कर्म को
आत्म समर्पित देव
कर्म आभाव कृत कर्म नाश हो
कर्म क्षीण पाता परम
जड़ चेतन से भिन्न.४.


आदि कारण त्रिकाल पर
काल रहित वह ईश
संयोग निमित्त का हेतु जो
स्थित है स्व चित्त
विश्व रूप जग रूप वह
आदि पुरुष पर देव
स्तुति के वह योग्य है
उसे उपासें नित्य.५.


जग प्रपंच जिससे चले
वृक्ष कलाकृति भिन्न
पाप शमनम् धर्म बहु
जग अधिपति आधार जग
आत्म स्थित देख साधक
ब्रह्म अमृत को प्राप्त.६.



ईश्वर का ईश्वर वही
सकल देव के देव
पतियों के वह परमपति
ब्रह्म अंड के स्वामि
वह स्तुति के योग्य है
परम परे है जान.७.


कार्य कारण है नहीं
नहीं अधिक सम नाहिं
विविध ज्ञान अरु बल क्रिया
सुनी स्वभाविक दिव्य.८.


नहिं जगत में ईश सम
नहीं कोउ है चिन्ह
सबका कारण कारणाधिप परम
नहिं जनक नहिं स्वामी.९.



मकड़ी अपने जाल से
जस आच्छादित होत
प्रधान स्वभाव आच्छादित
पर परमेश्वर अवलम्ब सब.१०.


एक देव हृदि व्याप्त है
गूढ़ रूप सब प्राणि
कर्म अधिष्ठा भूत वास वह
निर्गुण साक्षी चेत विशुद्ध.११.


एक अकेला बहुत से
शासक निष्क्रिय तत्व
एक बीज बहु रूप प्रकट हो
धीर आत्म में देख
                धीर देख अस ईश को
                शाश्वत सुख नहिं अन्य.१२.


एक नित्य चेतन परम
काम भोग बहु चेत
साँख्य योग से प्राप्त जो
सबका कारण देव
ऐसे देव को जानकार
सकल पाश से मुक्त.१३.


ना प्रकाशे सूर्य शशि
नक्षत्र भू नहिं ज्योति
        किमि प्रकाशे अग्नि उस
सर्व प्रकाशित उसी परम से
जग  प्रकाशित  उस प्रकाश से
परम दिव्य से सभी प्रकाशित.१४ 


ब्रह्म अंड के बीच में
एक अंड परिपूर्ण
सलिल अनल में व्याप्त है
जान मृत्यु से पार
अन्य न कोउ मार्ग है
परम धाम की प्राप्ति.१५.


ज्ञान रूप पर परम जो
विश्वाक्रत सर्वज्ञ
आत्म योनी है वह परम
और काल का काल
गुणी सर्ववित गुणेश है
प्रधान क्षेत्रज्ञपति जान
जन्म मृत्यु में बांधता
स्थिति मुक्ति का हेतु.१६.


तन्मय अमृत स्वरूप वह
सर्वज्ञ पूर्ण सर्वत्र
ब्रह्म अंड रक्षा करे
सदा जान जग ईश
नहीं ईश कोउ अन्य है
जो जग शासक होय.१७.  


ब्रह्मा को जनता वही
ज्ञान  देत सब वेद
आत्म बुद्धि का कारकम्
मुक्ति हेतु अवलम्ब.१८.


परम निष्क्रिय शान्त निर्मल



निष्कल निर्दोष अमृत सेतु रूप
अग्नि दग्ध काष्ठ  सम
परम ईश स्मरामि.१९.

नोट –पद २० से २३ तक कोई विशेष  बात नहीं है.


जो धारें खम चर्मवत
नहिं जाने परदेव
सकल शोक का नाश हो
जो मानें उपदेश.२०.


श्वेताश्वतर ऋषि जाना बहुत
निज तप कृपा परदेव
दिया ज्ञान ऋषि विद्वजन
परम पवित्र उपदेश.२१.


परम ज्ञान वर्णित हुआ
पुराकल्प वेदान्त
गुह्य न उपदेशित अशांत चित
जो निज पुत्र न शिष्य.२२.



जिनकी भक्ति देव में
जिनकी निज गुरु भक्ति
उनके हृदय प्रकाशता
मुनि का कहा उपदेश.२३.


    ॐ तत् सत्
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उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् -पाँचवां अध्याय - बसन्त


श्वेताश्वतरोपनिषद्
             Author of Hindi verse –Prof Basant


   पाँचवां अध्याय

ब्रह्मा से भी अति परे
अक्षर गूढ़ अनन्त
विद्याविद्य द्वे हैं निहित
विद्याविद्य का ईश
क्षर तू जान अविद्या को
अक्षर विद्या जान
क्षर अक्षर से भिन्न जो
अति विलक्षण जान.१.

योनी योनी का एक अधिष्ठा
विश्वरूप का है जो कारण
जिसके कारण ज्ञान कपिल को
जिसने देखा जन्म कपिल का.२.


आदि सृष्टि एक देव जो
बहु विधि बांटे जाल  
नष्ट करे संहार काल में
पुनः रचे पहले के जैसे
लोकपाल पर शासन करता
परम ईश वह महामहिम है.३.

एक भानु सब ओर प्रकाशित
दायें बायें ऊपर नीचे
वरण्यदेव अस ईश सदा वह
योनी योनी पर शासन करता.४.


कारण सबका परम है
स्वभाव प्रकट रचना विविध
योग सर्वगुण जो करे
एक जगत का ईश.५.



गूढ़ ज्ञान है अति समीप 
ब्रह्मा जाने ब्रह्म योनी उस
पुरा देव और ऋषि भी जाने
जान अमृत हो गए सभी वह.६.


सकल गुणों से बंधा हुआ जो
कर्म करे फल के लिये
भोगी भी वह अपने फल का
विविध रूप में प्रकट
तीन गुणों से युक्त जो
अधिपति जो है प्राण
नाना कर्म प्रेरित हुआ
विविध योनी को प्राप्त.७.


अंगुष्ठ सम रवि तुल्य जो
संकल्प अहं से युक्त
बुद्धि आत्म गुण अराग्र सम
जीव दृष्ट है विज्ञ.८.


दसहजारवां अग्र बाल का
एक भाग सम जीव है
पार अद्भुत इतना ही वह है
एक भाग प्रकटे अनन्त.९.


ना स्त्री ना पुरुष है
ना नपुंसक जान
जिस जिस धारे देह को
उस उस सा हो जात.१०.



संकल्प दृष्टि स्पर्श मोह
वृष्टि भोज जलपान
जन्म वृद्धि हो प्राणी की
कर्मगति से रूप
देही जाता लोक विविध में
विविध देह को प्राप्त.११.


निज कर्मों के गुण बंधा
आत्म गुणों स्व साथ
स्थूल सूक्ष्म बहु रूप में
कारण अपर संयोग.१२.


संसार मध्य में व्याप्त जो
आदि अन्त से हीन
सब जग की रचना करे
रूप विविध जग पूर्ण
एक देव को जानकर
सर्व पाश नर मुक्त.१३.


श्रद्धा भक्ति से जानकर 
भावाभाव कारणम्
अवलम्ब हीन शिव रूप जो
सोलह सर्ग कारकम्
परम देव को जानकर
काल पाश भय मुक्त.१४.

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BHAGAVAD-GITA FOR KIDS

    Bhagavad Gita   1.    The Bhagavad Gita is an ancient Hindu scripture that is over 5,000 years old. 2.    It is a dialogue between Lord ...