Thursday, November 10, 2011

वेदान्त /VEDANT-अध्याय -१३ -तुरीयम्-पूर्ण विशुद्ध ज्ञान -Prof. Basant


           तुरीयम्-पूर्ण विशुद्ध ज्ञान


यहाँ माया का अंश मात्र भी नहीं होता. पूर्ण विशुद्ध ज्ञान शान्त अवस्था में स्थित होता है. इसलिए इस अवस्था को शिव कहा है. इस अवस्था में पूर्ण चैतन्य, आनन्द और शान्ति है. यह वेश्वानर, तेजस एवम प्राज्ञ का आधार है. यह ब्रह्म कहलाता है. यह अवस्था ॐ का चौथा पाद कहलाती है.


मांडूक्योपनिषद्  स्पष्ट  करता है-

भीतर बाहर प्रज्ञ ना
ना प्रज्ञाघन जान
नहीं प्रज्ञ अप्रज्ञ नहिं
नहीं दृष्ट अव्यवहार्य
नहीं ग्राह्य नहिं लक्षणा
नहीं चिन्त्य उपदेश
जिसका सार है आत्मा
जो प्रपंच विहीन
शान्त शिवम अद्वितीय जो
ब्रह्म का चोथा पाद.


मात्रा रहित ॐकार है
ब्रह्म का चौथा पाद
व्यवहार परे प्रपंच परे
कल्याणम् है आत्म
आत्म बोध कर आत्म से
                आत्म प्रवेशित नित्य.

साधक असम्प्रज्ञात समाधि में इस अवस्था का आभास  प्राप्त करता है. इस  अंतिम अवस्था को स्वरूप स्थिति कहा गया है.इस अवस्था को शब्दों में नहीं बताया जा सकता. इसे बोध भी कहते हैं.
यहाँ न कुछ दिखायी देता है न् सुनायी देता है. यह सर्वथा विलक्षण स्थिति है. यहाँ बुद्धि का अस्तित्व पूर्णतया समाप्त हो जाता है. इस आत्मानंद के अमृत रूपी महासागर को वाणी से नहीं बताया जा सकता, मन बुद्धि से चिन्तन नहीं किया जा सकता.
यहाँ वह जानता है-

मैं ईश्वर
मैं नारायण हूँ
राम कृष्ण सत् साईं मैं हूँ
मैं जगदीश्वर
मैं ही शंकर
मैं ही विश्व जगत आधार
मैं ही रूद्र शिवा भी मैं हूँ
मैं ही आत्म परम सत् सार
मैं तीर्थंकर मैं ही ब्रह्मा
मैं ही विष्णु सत्य संसार
मैं ही अणु हूँ
मैं विराट हूँ
मैं निर्गुण मैं वृहद आकाश
मैं योगी योगीश पुरुष मैं
मैं अक्षर मैं ही ॐकार.



        ........................................



Wednesday, November 9, 2011

वेदान्त ज्ञान /VEDANT-अध्याय -१२- सुसुप्ति का रहस्य-Prof. Basant


         सुसुप्ति का रहस्य

सुषुप्ति काले सकले विलीने
तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति – केवल्य

प्रत्येक प्राणी के लिए नीद आवश्यक है नीद की दो अवस्थाएँ है.स्वप्नावास्था और सुषुप्ति. सुषुप्ति वह अवस्था है जब कोई स्वप्न भी नहीं रहता. प्रश्नोपनिषद बताता है जब उदान वायु द्वारा CNS (स्नायुतंत्र पर) पूर्ण रूप से अधिकार कर लिया जाता है तब सुषुप्ति अवस्था होती है.
वेदान्त बताता है सुषुप्ति काल में इन्द्रियों और उनके विषय नहीं रहते. इस अवस्था में कोई आसक्ति न होने से यहाँ जीव आनन्द का अनुभव करता है.
सुषुप्ति काल में स्थूल और सूक्ष्म दोनों विलीन हो जाते हैं.व्यावहारिकसत्ता और स्वप्न प्रपंच अपने कारण अज्ञान में लीन हो जाते हैं. केवल शुद्ध चेतन्य अंश  उपस्थित रहता है. इस अवस्था में ईश्वर और  जीव आनन्द का अनुभव करते  हैं परन्तु इस समय वृत्ति अज्ञानमय होती है

मांडूक्योपनिषद्  सुषुप्ति  को स्पष्ट  करता है.

नहीं स्वप्न नहिं दृश्य
सुप्त सम है ज्ञान घन
मुख चैतन्य परब्रह्म
आनन्द भोग का भोक्ता
तीसर पाद पर ब्रह्म.

मकार तीसरी मात्रा
माप जान विलीन
सुसुप्ति स्थान सम देह है
प्रज्ञा तीसर पाद
जान माप सर्वस्व को
सब लय होत स्वभाव.

चैतन्य से दीप्त अज्ञान वृत्ति से मुक्त होकर आनन्द को भोगता है. इसी कारण सोकर उठा हुआ मनुष्य कहता है मैं सुख पूर्वक सोया ,बढ़े चैन से सोया, इन शब्दों से सुषुप्ति में आनन्द के अस्तित्व का पता चलता है. मुझे कुछ याद नहीं है,इससे अज्ञान के अस्तित्व का भी  पता चलता है.

वृहदारण्यक उपनिषद् कहता है मनुष्य के शरीर में हिता  नामक 72000 नाडियों हृदय (CNS) से निकल कर समस्त शरीर में व्याप्त हैं, उनमें फैलकर शरीर में व्याप्त हुआ शयन करता है. छान्दग्योपनिषद में कहा है शरीर में व्याप्त हुआ जब शयन करता है तो कोई स्वप्न नहीं देखता है सब प्रकार से सुखी होकर नाडियों में व्याप्त हो सोता है.इस अवस्था में कोई पाप इसे स्पर्श नहीं करते. श्रुति कहती हैं, यह जीव सोते हुए सत् युक्त होता है. वृहदारण्यक उपनिषद् बताता है सोते हुए जीवात्मा न बाहर की किसी वस्तु को जानता है न भीतर की किसी वस्तु को जानता है.

सोते हुए जीव अपने उदगम स्थान में पहुँचता है और वहीँ से वापस होत है परन्तु अज्ञानमय  होने के कारण सुसुप्ति में बोध नहीं होता.

वृहदारण्यक उपनिषद् बताता है जो जीवात्मा सोता है वही जागता है. प्राज्ञ ब्रह्म की ऊपर से नीचे दूसरी अवस्था है जिसे जीवात्मा सुसुप्ति में उपलब्ध होता है. यहाँ आनन्द है पर यहाँ बोध नहीं है.


..............................................................................


Tuesday, November 8, 2011

वेदांत-vedant-अध्याय-११- स्वप्न का विज्ञान- स्वप्न में दांत वाले पुरुष को देखना मृत्यु का सूचक है.-Prof.Basant


            स्वप्न का विज्ञान

स्वप्न में जो भी देखा सुना जाता है उसे सृष्टि में किसी न किसी जगह किसी न किसी जीव अथवा पदार्थ के रूप में होना निश्चित है.

हम रात भर स्वप्न देखते हैं. दिवा स्वप्न भी अक्सर लोग देखते रहते हैं, दिवा स्वप्न कल्पना कहलाते हैं. नीद में देखा गया स्वप्न ही स्वप्न होता है. कभी कभी कुछ कम अवधि  के स्वप्न याद रहते हैं.
श्रुति में स्वप्न के विषय में जगह जगह चर्चा हुयी है.
वृहदारण्यक उपनिषद् में स्वप्न के विषय में प्रसंग है,जिस प्रकार एक राजा अपने सेवक और प्रजा के साथ देश का भ्रमण करता है उसी प्रकार जीव स्वप्नावस्था  में प्राण, शब्द, वाणी आदि को लेकर इस शरीर में इच्छानुसार विचरता है. वृहदारण्यक उपनिषद्  में वर्णन है स्वप्नावस्था में जीव लोक–परलोक दोनों देखता है और दुःख सुख दोनों का अनुभव करता है. इस स्थूल शरीर को अचेत करके जीव  वासनामय शरीर की रचना करता है फिर लोक परलोक देखता है.
इस अवस्था में देश-विदेश,नदी, तालाब, सागर, पर्वत मैदान. वृक्ष, मल, मूत्र, स्त्री, पुरुष, सेक्स, क्रोध, भय आदि नाना प्रकार के संसार की रचना कर लेता है.
जीव द्वारा स्वप्न में भी सृष्टि-सांसारिक पदार्थों की रचना  होती है. यह रचना अत्यंत रहस्यमय और अति विचित्र होती है.

मांडूक्योपनिषद्  में गूढ़ रूप से स्वप्न को स्पष्ट किया है.

स्वप्न भांति सम व्याप्त जग
ज्ञान ब्रह्म पर ब्रह्म
सात अंग उन्नीस मुख
तैजस दूसर पाद.

विशेष – सात अंग सात लोक हैं. मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहत्रधार चक्र. उन्नीस मुख पांच कर्मेन्द्रियाँ,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ.पांच प्राण- प्राण, अपान, समान,’व्यान, उदान तथा मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार.

उकार मात्रा दूसरी
और श्रेष्ठ अकार
उभय भाव है स्वप्नवत
तैजस दूसर पाद

स्वप्न में जीवात्मा अपनी सभी उपाधियों के समूह साथ एक होता है,इस समय अन्तःकरण तेजोमय होने के कारण इस अवस्था में आत्मा को तैजस कहा है. तैजस ब्रह्म की ऊपर से नीचे तीसरी अवस्था है. स्वप्नावस्था में दोनों जीवात्मा और आत्मा का तैजस स्वरूप  मनोवृत्ति से शब्द स्पर्श रूप रस गंध का अनुभव करते हैं. तैजस सूक्ष्म विषयों का भोक्ता है. जीवात्मा और आत्मा  का तैजस स्वरूप दोनों अभेद हैं जैसे जल की बूंद में और जलाशय मैं पडने वाला आकाश का प्रतिविम्ब.
कठोपनिषद कहता है- ‘य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः’ यह पुरुष जो नाना भोगों की रचना करता है सबके सो जाने पर स्वयं जागता है. यहाँ पुरुष को कामनाओं का निर्माता बतलाया है. अतः  सिद्ध है स्वप्न में भी सृष्टि होती है,
क्या स्वप्न में हुई सृष्टि वास्तविक है.-तात्कालिक रूप से स्वप्न में हुई सृष्टि का कोई अस्तित्व नहीं दिखायी देता परन्तु इस विषय में मेरा निश्चित विचार है कि स्वप्न में जो भी देखा सुना जाता है उसे सृष्टि में किसी न किसी जगह किसी न किसी जीव अथवा पदार्थ के रूप में होना निश्चित है. स्वप्न और सृष्टि के  विकास का गहरा सम्बन्ध है स्वप्न है तो सृष्टि है और सृष्टि है तो स्वप्न हैं.

स्वप्न के शुभ–अशुभ परिणाम-
श्रुति का इस विषय में निश्चत मत है कि स्वप्न भविष्य में होने वाले शुभ–अशुभ परिणाम के सूचक हैं.
एतरेय आरण्यक के अनुसार स्वप्न में दांत वाले पुरुष को देखना मृत्यु का सूचक है.

छान्दग्योपनिषद में कहा है कामना की पूर्ति के लिए स्वप्न में स्त्री को देखना समृद्धि  का सूचक है.आदि 

Monday, November 7, 2011

वेदान्त-सरल वेदान्त/SARAL VEDANT-अध्याय-१०- माया-Prof. Basant



                                  माया

माया –माया का शाब्दिक अर्थ भ्रम है. परन्तु माया भ्रम  न होकर भ्रम पैदा करने वाला तत्त्व है. एक वस्तु में दूसरे का भ्रम जैसे रस्सी को सांप समझना. रेगिस्तान में पानी की प्रतीति जिसे मृगमरीचिका भी कहते हैं. यह सृष्टि माया  ही है अर्थात इसके कारण ब्रह्म जगत के रूप में दिखाई देता है.
यह सत् भी है और असत भी है. व्यवहार में यह सत् जैसी दिखायी देती है परन्तु यथार्थ में असत है. इसे ठीक ठीक शब्द नहीं दिया जा सकता इसलिए इसे अनिर्वचनीय कहा है. यह माया व्यक्त भी है और अव्यक्त  भी है. इस माया को जड़, अज्ञान, असत, अविद्या भी कहा है.
अज्ञान (माया) को न सत् कह सकते हैं न असत क्योंकि अज्ञान भाव रूप है उसका अस्तित्व है. अज्ञान को सत् भी नहीं कह सकते क्योंकि इसकी सत्ता यथार्थ नहीं है.इसलिए इसे अनिर्वचनीय कहा है.यह त्रिगुणात्मक-सत्व रज तम रूप है. ज्ञान का विरोधी तत्त्व है. ज्ञान होने पर अज्ञान (माया) नष्ट हो जाता है.
यह अज्ञान (माया) ब्रह्म की शक्ति है. माया (विशुद्ध सत्त्व) में प्रतिविम्बित ब्रह्म, ईश्वर कहलाता है और अज्ञान में प्रतिविम्बित ब्रह्म, जीव कहलाता है. अज्ञान को ब्रह्म (विशुद्ध ज्ञान) प्रकाशित करता है.
महान उपाधि होने के कारण इसे महत् कहा गया है.

उपनिषद् से माया के उद्धरण -

एक नेमी है त्रिचक्रमय
सोलह सर हैं जान
अर पचास, हैं बीस सहायक
छह अष्टक तू जान
विविध रूप से युक्त यह
एक पाश से बद्ध
तीन मार्ग अरु दो निमित्त
मोह चक्र को पश्य.५-१- श्वेताश्वतरोपनिषद्.

त्रिचक्रमय-सत्व,रज,तम से युक्त. सोलह सर-
अहँकार,बुद्धि,मन,आकाश,वायु,अग्नि,जल. पृथ्वी,प्रत्येक के दो स्वरूप सूक्ष्म और स्थूल. बीस सहायक-पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ,पांच प्राण,पांच विषय. छह अष्टक (आठ प्रकार की प्रकृति, आठ धातुएं, आठ ऐश्वर्य, आठ भाव. आठ गुण, आठ अशरीरी योनियाँ, तीन मार्ग-ज्ञानमय (शुक्ल)अज्ञानमय (कृष्ण)और परकायाप्रवेश. दो निमित्त-सकाम कर्मऔर स्वाभविक कर्म.कुलयोग –पचास.  इन्हें पचास अर कहा है.

जिन्हें अविद्या व्याप्त है
विद्या मूढ तू जान
नाना योनी भटकते
                     अंध अंध दे ज्ञान.५-२-कठ उपनिषद्.

यह अद्भुत तीन गुणों से युक्त अविद्या परमात्मा की शक्ति है जिससे यह सारा जगत उत्पन्न हुआ है. इसके कार्य से ही इसका अनुमान हो पाता है.  ब्रह्म से उत्पन्न यह ब्रह्म को आच्छादित किये है.यह ब्रह्म ज्ञान से नष्ट होती है.

...................................................................................................................

BHAGAVAD-GITA FOR KIDS

    Bhagavad Gita   1.    The Bhagavad Gita is an ancient Hindu scripture that is over 5,000 years old. 2.    It is a dialogue between Lord ...