Saturday, October 22, 2011

उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् - चौथा अध्याय - बसन्त


श्वेताश्वतरोपनिषद्
                         Author of Hindi verse –Prof Basant
              
     चौथा अध्याय



अवर्ण है निहितार्थ वह
अनेक वर्ण धारता
शक्ति योग आदि से
सृष्टि आदि में प्रकट
अन्त में विलीन जग
एक है देव वह
योग युक्त कर सदा
शुद्ध बुद्धि दे  सकल.१.


आदित्य अनल वायु है
आप चन्द्र  शुक्र है
प्रजापती ब्रह्मा वही
वही परम पर देव.२.


तू नर है तू नारि तू
तू कुमार कुमारी
वृद्ध हो तू चले दण्ड संग
तू विराट तू विश्व मुख.३.


नील वर्ण कीट है
लाल हरित पक्षी भी
मेघ है ऋतु सभी
सप्त सागर तू हि है
विश्व भूत तुझसे हैं
आदि विभु वर्तमान.४.


त्रिगुणमयी बहु प्रजा रचे
लाल श्वेत अरु श्याम
एक अजा को एक अज भोगे
जो रहता आसक्त सदा
और दूसरा अज जो त्यागे
भोगी नित्य अजा.५.


एक साथ रहते दो पक्षी
परम मित्र एक वृक्ष में
एक स्वाद ले फल को भोगे
दूसर देखे फल को केवल.६.


आसक्त पुरुष एक वृक्ष में
असमर्थ मोह से शो़क
निज से देखे भिन्न जब
महिमा उस पर ईश
 देख ईश को सेवित सब से
सदा शोक से मुक्त.७.


जिसमें स्थित देव सब
परम व्योम अक्षर में वेद
वाको जाने जो नहीं
वेद ज्ञान सब व्यर्थ
पर जो उसको जानता
भली भांति स्थित परम.८.

छंद यज्ञ कृतु अन्य व्रत
भूत भवि भव ज्ञान
परम रचे जग इस अजा
दूसर बंधता मायया.९.


माया जान तू प्रकृति को
मायापति मह ईश
उसके  अवयव भूत से
सकल जगत हे व्याप्त.१०.  


योनि योनी में पैठ एक
जगत लीन जेहि जात
रूप प्रकट बहु आदि में
ईश वरद परदेव
ईश जान निश्चय परम
परम शान्ति को प्राप्त.११.


देव सकल उत्पन्न जेहि
कारण उद्भव रुद्र
विश्वाधिप महर्षि जा 
जेहि हिरण्यमय जान
वह परमेश्वर कर कृपा
युक्त सदा शुभ बुद्धि.१२.


जो देवों का देव है
जिससे आश्रित लोक
जो शासन  द्वि चतुष्पद
हवि पूज्य उस देव.१३.


अणु से जो अति सूक्ष्म है
हृदय गुहा में पैठ
अखिल विश्व रचना करे
विविध रूप में दृश्य
जिसने व्यापा सकल जग
एक शिवा सो जान
जाव देव उस एक को
परम शान्ति को प्राप्त.१४.


काले रक्षति भुवन को
सर्वभूत जो गूढ़
विश्वाधिप को जान तू
ध्याय जिसे ब्रह्मर्षि
और देवगण ध्यान जेहि
जान देव परदेव
परम देव को जानकार
मृत्यु पाश को काट.१५.


घृत सम सार अति सूक्ष्म है
एक देव शिव रूप
सकल भूत में गूढ़ है
सकल जगत परिव्याप्त
ऐसे तत्व को जानकर
सर्व पाश भय मुक्त.१६.


परम देव कर्ता जगत
सम्यक हृदि में विज्ञ
हृदि धी मन से ध्यान कर
प्रत्यक्ष सदा यह ईश
जो इसको हैं जानते
अमृत रूप  वह जान.१७.


अज्ञ नष्ट नहिं दिवा न रात्री
ना सत् असत विशुद्ध शिवा बस
अविनाशी है वरेण्य सवित से
आदि ज्ञान स्फूर्ण उसी से.१८.


ऊर्ध्व से नहिं नीच से
इधर उधर नहिं मध्य
इसको कोई पकड़ सके ना
महत् यशश्वी उपमा नाहीं.१९.


नहिं दृष्टि कोई टिके
नहीं दृष्ट यह चक्षु
जो साधक देखें हृदय
जान अमृतमय होत.२०.


तू अजन्मा रूद्र है
भीरु तेरी शरण में
दक्षिण मुख जो तोर है
जन्म मृत्यु मम पाहि.२१.


नाना हविष आवाह्य कर
रूद्र पुकारें नित्य
कुपित न हो मम पुत्र पौत्र से
आयु क्षीण नहिं गौ अश्वों की
नहीं कभी कोई वस्तु क्षीण हो
नहीं नाश कर वीर पुरुष का.२२.



नोट -उपनिषद का यह पद(२२) क्षेपक  लगता है.

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Wednesday, October 5, 2011

उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् - तीसरा अध्याय - बसन्त


   श्वेताश्वतरोपनिषद् 
                         Author of Hindi verse -Prof. Basant
     
      तीसरा अध्याय



संसार जंजाल का ईश जो
निज स्वरूपिणी शक्ति
इस से वह शासन करे
सकल लोक वह एक
विस्तार जन्म जो जानते
अमृत अमृत वे विज्ञ.१.



निज स्वरूपिणी शक्ति  से
सकल लोक  शासन करे
एक देव वह  रूद्र है
नहीं अन्य कोउ जान
सकल जीव के हृदय में
स्थित रच संसार
सकल लोक का रक्ष है
प्रलय समेटे सर्व.२.



सब ओर उसके हाथ हैं
सब ओर उसके पैर
चक्षु मुख है विश्व उसका
एक देव है ख़म् और भू का
उसी देव ने हाथ दिए हैं
उसने पक्षी पंख संजोये.३.



उद्भव कारण देव सब
विश्वधिप वह रूद्र
महा ऋषी शुभ बुद्धि का
जेहि से जन्म हिरण्य.४.



अघोर प्रकाशिनि पुण्य से
कल्याण मूर्ति हे रूद्र
पर्वत वास शिवा परम
शान्त रूप हम लक्ष.५.



जेहि शर लिए हाथ में
सञ्चालन गिरि  शान्त
शिवा शान्त शर को करें
जीव जगत नहिं नष्ट.६.
  


जीव जगत से श्रेष्ठ है
श्रेष्ठ हिरण्यमय जान
देह रूप सब प्राणी में
गुह्य गूढ़ हो पैठ
सकल विश्व आवर्त कर
व्यापक है एक देव
ऐसे प्रभु को जानता
अमृत अमृत को प्राप्त.७.



को विदु कहता जानता
महत् महत् है देव
अज्ञान तमस से पर वही
आदित्य वर्ण है जान
जान मृत्यु को पार वह
अन्य न कोई मार्ग.८.



नहीं अन्य कोउ श्रेष्ठ है
सूक्ष्म महत् नहिं अन्य
वृक्ष भांति दिवि स्थित
पूर्ण पुरुष जग पूर्ण.९.



श्रेष्ठ हिरण्यमय पुरुष से
निराकार पर ब्रह्म
सकल दोष से शून्य है
जान अमृत वह विज्ञ
जो नर जानत नाहीं हैं
बार बार दुःख प्राप्त.१०.




सर्व चहुँ मुख शीश हैं
ग्रीवा है सब ओर
हृदय गुहा में वासते
सर्वगत शिव रूप.११.


ईश सभी से महत् है
शासक प्रभु वह जान
अविनाशी ज्योती पुरुष
निर्मल सत्त्व प्रवर्त्त.१२.



अंगुष्ठ मात्र वह पुरुष है
सदा हृदय में वास
मना ईश निर्मल हृदय
प्रत्यक्ष शुद्ध मन साथ
ऐसे ब्रह्म को जानते
अमृत अमृत को प्राप्त.१३.

अंगुष्ठ मात्र -  सूक्ष्म परन्तु महत्वपूर्ण जैसे हाथ में अंगूठा.



सहस्र शीर्ष  सहस्र चक्षु
सहस्र पाद पुरुष के
जग घेरे सब ओर से
दस अंगुल स्थित परम.१४.



भूत भवि  भव जगत का
नित्य अन्न परिपुष्ट
सर्व जग ही परम है
जान अमृत का ईश.१५


सब ओर जिसके पैर कर हैं
आंख सिर मुख सब ओर हैं
कर्ण हैं चुन ओर जिसके
व्याप्त जग सब ओर से.१६.



भोगता सब इन्द्रियों से
इन्द्रियों से रहित है
ईश है प्रभु जान सबका
आलम्ब जग का जान ले.१७.



चर अचर सम्पूर्ण जग
जिसके वश वह हंस
नौ द्वारी पुर देह बस
लीला जग में जान.१८.



हाथ पैर से रहित है
गृहण करे सब वस्तु
आँख कान बिन देख सुन
वेग गमन सर्वत्र
सभी वेद्य को जानता
नहिं कोउ उसको वेद
ज्ञानी उसको वाचते
पुरुष आदि महान.१९.


सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है
महत् महत् है जान
जीव बुद्धि की पेठ गुहा में
सबका रचनाकार
महिमा जाने अकृतु ईश की
वीत  शोक नर  मुक्त.२०.




वेद विज्ञ वर्णन करें
जन्म रहित है नित्य
विभु व्यापक सर्वत्र है
                अजर पुराण मैं वेद्य.२१.




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उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् - दूसरा अध्याय - प्रो बसन्त


   श्वेताश्वतरोपनिषद्
                               Author of Hindi verse-Prof.Basant
      दूसरा अध्याय


लोक जन्म जिस ईश से
मन धी स्थापय तत्त्व
जिन देवों की दिव्य इन्द्रियाँ
सिमटे पार्थिव दृश्य
स्थापित दृढ सभी इन्द्रियाँ
मन दृढ कर निज तेज.१.



लोक जन्म जिस ईश से
मन स्थापित भक्ति
प्राप्त ईश आनन्द को
पूर्ण शक्ति उद्योग.२.



लोक जन्म जिस ईश से
ज्ञान स्वर्ग आकाश
मन इन्द्रिय धी जोड़कर
प्रेरित हम उस ध्यान.३.



ब्राह्मण निज मन जोड़ते
धिय को करते निष्ठ
अग्नि होम जेहि उपजये
कारण सकल विचार
जान वृहत सर्वज्ञ सवि
स्तुति बहु विभु देव.४.



स्वामी ब्रह्म सब और दोउ
बारम्बार नमामि
मम स्तुति विस्तार हो
कीर्ति श्रेष्ठ जस जान
सकल पुत्र उस अमृत के
वास दिव्य श्रुण लोक.५.



मथ कर पता अग्नि को
वायु रोक सब द्वार
आनन्द सोम जँह फैलता
मन तंह होत विशुद्ध .६.



लोक जन्म जेहि देव से
प्राप्त प्रेरणा पूर्व
कर सेवा उस ब्रह्म की
कृपा प्राप्त परब्रह्म
पूर्व कर्म नहिं विघ्न तब
कृपा प्राप्त परब्रह्म.७.



त्रय को उन्नत विज्ञ कर
अचल धार निज देह
इन्द्रियाँ हृदि मेंलीन कर
करे योग स्थाय
नाव चढ़े ॐकार की
भय संसार प्रवाह.८.




विज्ञ युक्त कर चेष्टा
प्राणा प्राण नियम्य
प्राण क्षीण निकास दे
सावधान मन साध
दुष्ट अश्व रथ साधकर
लक्ष प्राप्त दृढ ध्यान.९.



कंकण बालू अग्नि ना
शुचि सम स्थल देख
शब्द आश्रय जल अनुकूल जँह
नेत्र कष्ट नहिं वायु
स्थिर गुहा में बैठकर
कर मन को स्थाय.१०.


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Tuesday, October 4, 2011

उपनिषद-श्वेताश्वतरोपनिषद् - प्रथम अध्याय - प्रो बसन्त


           ॐ
श्वेताश्वतरोपनिषद्
           AUTHOR OF HINDI VERSE PROF BASANT 
  
 प्रथम अध्याय



ॐ रक्ष गुरु शिष्य सह
पालन कर एक साथ
शक्ति प्राप्त एक साथ ही
तेजोमय स्वाध्याय
कभी नहीं विद्वेष हम
शान्ति शान्ति ॐ शान्ति.१.



ज्ञानी कहते ज्ञानि से
कारण ब्रह्म है कौन
किससे यह उत्पन्न जग
किससे स्थित जान
कौन अधिष्ठा जगत का
सुख दुःख जेहि जग व्याप्त.२.



कहे काल कोई कारणम्
कोई प्रकृति को जान
कर्म कहे कारण कोई
भवितव्यता को मान
पांच भूत को मानता
कोई माने जीव
सुख दुःख में परतंत्र है
फिर को कारण जान.३.



ध्यान योग से देखकर
परम देव का ज्ञान
पुरुष काल कारण का शासक
निज गुण गूढ है जान.४.



एक नेमी त्रिचक्रमय
सोलह सर हैं जान
अर पचास, हैं बीस सहायक
छह अष्टक तू जान
विविध रूप से युक्त यह
एक पाश से बद्ध
तीन मार्ग अरु दो निमित्त
मोह चक्र को पश्य.५.


त्रिचक्रमय-सत्व,रज,तम से युक्त. सोलह सर-अहँकार,बुद्धि,मन,आकाश,वायु,अग्नि,जल. पृथ्वी,प्रत्येक के दो स्वरूप सूक्ष्म और स्थूल. बीस सहायक-पांच ज्ञानेन्द्रियाँ, पांच कर्मेन्द्रियाँ,पांच प्राण,पांच विषय. छह अष्टक (आठ प्रकार की प्रकृति, आठ धातुएं, आठ ऐश्वर्य, आठ भाव. आठ गुण, आठ अशरीरी योनियाँ, तीन मार्ग-ज्ञानमय (शुक्ल) अज्ञानमय (कृष्ण)और परकायाप्रवेश. दो निमित्त-सकाम कर्म और स्वाभा विक कर्म.कुलयोग –पचास.  इन्हें पचास अर कहा है.




सर्वाजीवे ब्रह्मचक्र जो
सबका आश्रय भूत
जीव घूमता चक्र में
जान पृथक स्व ब्रह्म
पुनः ज्ञान से जानकार
ज्ञान ज्ञान परिपुष्ट
अमृत तत्त्व पता वही
जुड़े होत संतुष्ट.६.



जिसको गाते वेद हैं
सब आश्रय अवलम्ब
अक्षर थित त्रय लोक में
उर अंतर कर ध्यान
ब्रह्मज्ञ मुक्त सो जान कर
सदा ब्रह्म में लीन.७.



क्षर अक्षर से जन्मता
व्यक्ताव्यक्त संसार
जिसका धर्ता ईश है
जीव रूप आबद्ध
भोगी बन असमर्थ सा
जगत मोह आबद्ध
जान परम उस देव को
सकल पाश से मुक्त.८.



ईश जान सर्वज्ञ तू
जान सर्व-समर्थ
जान जीव को अज्ञ तू
और जान असमर्थ
पर अविनाशी दोउ वे
तीसरि शक्ति अजा
जीव भोग की रचना करती
पर अविनाशी तीन
विश्वरूप अनन्त आत्म है
नित्य अकर्ता जान
ब्रह्मरूप त्रय प्राप्त कर
बंध मुक्त सब पाश.९.



प्रकृति जान तू क्षर सदा
भोगी जीव अमृत अविनाशी
वश में रखता ईश दोउ 
कर मन उसमें नित्य
तन्मय हो लयलीन हो
तब सब माया मुक्त.१०.



ध्यान योग उस परम देव का
करता बन्धन मुक्त
सकल क्लेश से मुक्त हो
जन्म मृत्यु भय मुक्त
देह नाश के साथ ही
त्याग लोक ऐश्वर्य
आप्त काम विशुद्ध वह
सदा ब्रह्म स्वरूप.११.



जान आत्म को सर्वदा
सब उर अंतर पैठ
तत्त्व ना कोई श्रेष्ठ है
भोक्ता भोग्य को जान
और जान कारण परम
सर्व विदित हो जात
जो जाने त्रय भेद को
जान उसे पर ब्रह्म .१२.



अग्नि दृश्य नहीं मूर्तिवत
लिंग नाश नहीं नाश
कर प्रयास इंधन ग्रहण
अग्नि प्रकट निज रूप
वैसे वो इस देह में
ग्रहण साध्य प्रणवेन.१३.



दक्षिण अग्नि बना देह को
प्रणव अग्नि उत्तर की
सदा ध्यान का मंथन करते
दृश्य परम को जान अग्नि सम.१४.



तिल में जैसे तेल है
घृत जेसे दधि माहि
जल श्रोत में नित्य है
अग्नि अरणि में वास
तैसे ही यह आत्मा
उर अंतर में वास
जो जानत अस आत्म को
उसे गृहण यह आत्म.१५.



दुग्ध घृत परिपूर्ण है
जगत पूर्ण है आत्म
आत्मविद्या तप यज्ञ से
सो परम है प्राप्त
जान आत्म वह तत्त्व है
                कहा उपनिषद् ब्रह्म.१६.




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Tuesday, September 27, 2011

GYAN VIGYAN / ज्ञान विज्ञान - यह तो तुम स्वयं जानते हो तुम कैसे हो उसके आधार पर तुम्हारा निर्णय होगा-Prof. Basant



टीवी में एक महिला बता रही थी आसमान में एक किताब है जिसमें मनुष्यों के कर्मों का लेखा जोखा लिखा जाता है. हो सकता है यह उस महिला के मन की सोच हो या फिर उसने कहीं पड़ा हो. ऐसे बहुत से भ्रम अथवा अंधविश्वास हम सभी किसी न किसी रूप में पाले होते हैं. हिन्दुओं में पौराणिक मान्यता है कि मनुष्य के कर्मों का लेखा जोखा चित्रगुप्त रखते हैं.
इस में केवल एक ही बात महत्वपूर्ण है कर्म फल. संसार के सभी धर्म इस विषय में  एक राय रखते हैं कि कर्मों के आधार पर उनके साथ न्याय किया जायेगा. शुभ कर्मों का शुभ परिणाम अशुभ कर्मों का अशुभ परिणाम. तो फिर क्या कर्मों का हिसाब किताब रक्खा जाता है या फिर क्या कोई और तरीका है जिससे जीव के कर्मों का ज्ञान हो सके. 
हम जो भी कार्य जिस भावना से करते हैं उस समय हमारी प्रकृति वैसी होती है. अच्छा, बुरा, सामान्य कार्य करते समय हमारी प्रकृति तदनुरूप हो जाती है. जो लगातार श्रेष्ठ कार्य करता है उसकी प्रकृति श्रेष्ठ हो जाती है. इसी प्रकार अधम कार्य करने पर प्रकृति अधम हो जाती है. जीवन में जेसी सोच वैसे कर्म वैसी प्रकृति. जीवन की इसी सोच और कर्म का प्रभाव हमारे जीवन के अंतिम दिनों में भी रहता है. व्यापारी व्यापार की सोचता है तो कलाकार कला की. कोई दुश्मन के बारे में सोचता हे तो कोई बेटी बेटे के बारे में. सोच के अनुसार हमारी प्रकृति बन जाती है अब जैसी प्रकृति वैसी अगली यात्रा. बाहरी दिखावे से यहाँ काम नहीं चलता है, इससे भी काम नहीं चलता कि लोग तुम्हें अच्छा कहते हैं या बुरा. यह तो तुम स्वयं जानते हो तुम कैसे हो उसके आधार पर तुम्हारा निर्णय होगा.

BHAGAVAD-GITA FOR KIDS

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