Thursday, November 15, 2012

तेरी गीता मेरी गीता -४- बसंत प्रभात


प्रश्न -आत्मज्ञान क्या है?

उत्तर- अपने वास्तविक स्वरुप का ज्ञान आत्मज्ञान है.सरल शब्दों में इसे बोध कहते हैं.यही ब्रह्म ज्ञान भी कहा जाता है.
ज्ञान की पूर्णता को प्राप्त कर लेना जिससे बढकर कुछ भी न हो. जो सदा एक सा रहे, जिसका क्षय न हो जिसको कम या अधिक न किया जा सके, जो पूर्ण हो ऐसा ज्ञान आत्मज्ञान कहा जाता है.
कुछ मनीषियों का कथन है कि परम शांति को प्राप्त होना आत्मज्ञान है.परन्तु परम शांति उस बोध का परिणाम है.पूर्ण बोध को प्राप्त मनुष्य स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है. कबीर कहते हैं- शान्ति भई   जब गोविन्द जान्या अर्थात गोविन्द को जानने पर ही शान्ति होती है. गोविन्द कोन है? गो अर्थात इन्द्रियां,जो इन्द्रियों का स्वामी है अर्थात ज्ञान. बोध और ज्ञान एक ही तत्व के पर्याय हैं. इसे पूर्ण चेतन्य भी कहा जाता है. यह ज्ञान ही आपका वास्तविक मैं है.

प्रश्न- ज्ञान को विस्तार से सुस्पष्ट करें.

उत्तर- मैं ज्ञान हूँ. मैं प्रत्येक प्राणी की बुद्धि के अंदर रहता हूँ. मैं पदार्थ में सुप्त रहता हूँ परन्तु मेरी उपस्थिति से ही जड़ में चेतन का संचार होता है. मैं सर्वत्र हूँ, मैं सर्वोत्तम हूँ, परम पवित्र हूँ, मेरे स्पर्श मात्र से अपवित्र भी पवित्र हो जाता है. मैं सर्व शक्तिमान हूँ, मैं पूर्ण हूँ मुझसे कितना ही निकल जाये फिर भी मैं पूर्ण रहता हूँ. न मुझे कोई कम कर सकता है न कोई अधिक कर सकता है. मैं सदैव स्थिर सुप्रतिष्ठित रहता हूँ. न कोई मुझे मार सकता है, न जला सकता है. न गीला कर सकता है, न सुखा सकता है, मैं नित्य हूँ, अचल हूँ, सनातन हूँ.
मेरा न आदि है, न अंत है, मैं सृष्टि का कारण  हूँ, मेरे सुप्त होते ही पदार्थ जड़ हो जाता है, मेरी  जागृति ही जीवन है अर्थात ज्ञान सत्ता से ही जड़ में जीवन और जीवन जड़ होता है. मैं जीवन का कारण हूँ, जड़ भी मेरा विस्तार है. मेरे स्फुरण की मात्रा से भिन्न भिन्न बुद्धि और भिन्न भिन्न स्वरुप के प्राणी उत्पन्न होते हैं, अलग अलग स्वाभाव लिए  भिन्न भिन्न कर्म करते हैं, पर मैं तटस्थ और एकसा रहता हूँ.
मैं पृथ्वी में गंध, जल में रस, अग्नि में प्रभा, वायु में स्पर्श और आकाश में शब्द रूप में प्रकट होता हूँ, मेरे कारण ही यह ब्रह्माण्ड टिका है. मैं बर्फ में जल की तरह संसार में व्याप्त हूँ. सब चर अचर का मैं कारण हूँ, सभी भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं. कोई जड़ तत्व मेरा कारण नहीं है. मेरे कारण ही जड़ चेतन का विस्तार होता है. मैं ही जड़ होता हूँ फिर उसमें चेतन रूप से प्रकट होता हूँ. जो मेरे शुद्ध रूप को प्राप्त हो जाता है वह सृष्टि के सम्पूर्ण रहस्यों को जान लेता है. सारा खेल मेरी मात्रा का है. मैं पूर्ण शुद्ध ज्ञान हूँ, मेरा दूसरा यथार्थ नाम महाबुद्धि है. परम बोध मेरा अस्तित्व है.

Monday, November 12, 2012

तेरी गीता मेरी गीता - ३ - बसंत प्रभात


प्रश्न- क्रिया से अक्रिय होने  को विस्तार से स्पष्ट करें.

उत्तर- क्रिया जीवन का चिन्ह है. बिना क्रिया के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आपकी क्रिया सांसारिक है तो आप भोगी हैं, संसार में आसक्त हैं.यही कर्म बंधन है.इसके विपरीत यदि आपकी क्रिया ईश्वरोन्मुख है, आप आत्मरत हैं तो आप अक्रिय हैं. यही भगवदगीता का कर्मयोग है. श्री भगवान कहते हैं जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है वही योगी है. भगवदगीता के पांचवें अध्याय में श्री भगवान सुस्पष्ट करते हैं -

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ।8।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ।9।

तत्व को जानने वाला योगी, मैं पन के अभाव से रहित हो जाता है और वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूघंता हुआ, भोजन करता, हुआ गमन, करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँख खोलता हुआ, मूँदता हुआ किसी भी शारीरिक कर्म में सामान्य मनुष्य की तरह लिप्त नहीं होता है। वह यह जानता है कि इन्द्रियाँ अपने अपने कार्यों को कर रही हैं अतः उसमें कर्तापन का भाव नहीं होता है।


प्रश्न- भगवदगीता में तीन शब्द आये हैं कर्म, अकर्म, विकर्म. कृपया इन्हें स्पष्ट करें. साथ ही यह भी विस्तार से  बताएं कि स्वाभाविक कर्म से क्या तात्पर्य है?

उत्तर-कर्म शब्द तात्पर्य सकाम कर्म से है, अकर्म वह हैं  जो क्रिया अथवा कर्म कर्तापन के अभिमान को छोड़कर  किये जाते हैं. विकर्म निंदनीय कर्म हैं जेसे अकारण हिंसा, अपशब्द, बलात्कार आदि.
आत्म तत्त्व के जिज्ञांसु साधक और आत्म  ज्ञानियों के लिए सकाम पूजन का निषेध है, यहाँ तक कि स्वर्ग की इच्छा भी त्याज्य है परन्तु यह भी यथार्थ है कि अनेक जन्मों का योग भ्रष्ट पुरुष ही आत्मज्ञान और निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है. साधारण मनुष्य अनेक इच्छा लिए जीता है, इसलिए फल की इच्छा के साथ  ईश्वर और देव पूजा करता है. इसलिए साधारण मनुष्य के लिए उपदेश है अपने अपने स्वभाव के आधार पर कर्म करते हुए तुम वृद्धि को प्राप्त हो। अपनी उन्नति करो.
भगवद्गीता का अनासक्त कर्म योग जन सामान्य के लिए नहीं है श्री भगवान ने जन सामान्य लिए स्वाभाविक कर्म विधान बताया है.
स्वाभाविक कर्म का अर्थ है जैसी आपकी प्रकृति है वैसे कर्म में लगे रहें. जिसका खेती करना स्वभाव है उसे खेती ही करनी चाहिए वह अच्छा सैनिक या डाक्टर नहीं हो सकता. इसी प्रकार जिसका स्वभाव सैनिक का हो वह अच्छा कृषक नहीं हो सकता. शहरों और कस्बों में आजकल देखा देखी का जमाना है. पड़ोसी का लड़का इंजीनियर तो मेरा क्यों नहीं. बच्चे की रूचि और स्वभाव का कोई मूल्य इन आधुनिक माँ बाप की नजरों में नहीं है. बचपन से नम्बरों की मारा मारी का जमाना है, बच्चे स्वाभाविकता खोते जा रहे हैं. बचपन से तनाव है. चित्त उद्विग्न रहता है. अतःस्वाभाविक कर्म का ज्ञान होना, बच्चे की प्रकृति को जानना तदनुसार उसको शिक्षित करना जरूरी है. इससे चित्त की उद्विग्नता, तनाव  समाप्त हो जाता है. मन प्रसन्न और करुणामय होने लगता है. प्रोग्रेसिव होना अच्छी बात है परन्तु अपनी रूचि और स्वभाव से सम्बंधित होनी चहिये.
जन सामान्य के लिए भगवद्गीता में श्री भगवान स्वाभाविक कर्म का उपदेश देते हैं.

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।35-3।

दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म (स्वभावगत कर्म ) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभावगत कर्म ) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती। अपने धर्म (स्वभाव) में मरना भी कल्याण कारक है दूसरे का स्वभाव भय देने वाला है अर्थात तुम्हारे अन्दर सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार तुम्हारा जो स्वाभाविक स्वभाव है उसका सरलता पूर्वक निर्वहन करो। तदनुसार कर्म करो.
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते है अर्थात सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार चेष्टा करते हैं। ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा। चेष्टाएं स्वाभाविक रुप से होनी हैं फिर उन्हें क्यों हठ पूर्वक बढ़ाया जाय। अतः अधिक परिश्रम करके दिन रात काम करते हुए भोग प्राप्त करने की विशेष चेष्टा (हठ) बुद्धिमानी नहीं है। विशेष चेष्टा से  तनाव बढ़ता है. चित्त उद्विग्न रहता है.
सहज स्वाभाविक कर्म जो उसे उसकी प्रकृति से मिले हैं को छोड़ दूसरे कर्मों में लगा मनुष्य कर्मों में बंधता है
अच्छा  जीवित शरीर अपने  उत्तम इन्द्रिय ज्ञान  के साथ अपने अंगों का उत्तम  प्रयोग कर ही अनुकूल परिस्थिति होने पर सर्वोत्तम परिणाम देता है.

भगवदगीता के अठारहवें अध्याय में कर्म का विज्ञान बताते हुए श्री भगवान कहते हैं-

कर्म सिद्धि के पांच हेतु कर्ता और आधार
विविध प्रथक चेष्टा करण और पांचवां देव।। 14।।

हे अर्जुन, तू कर्मों के पांच कारण को जान। अधिष्ठान ही जीव की देह है। इस देह में जीव (भोक्ता) इस देह को भोगता है अतः दूसरा तत्व जीव कर्ता है। प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव है, आत्मा का देह भाव जीव है। जीव देह में कर्ता, भोक्ता रूप में रहता है। तीसरा तत्व है करण अर्थात भिन्न भिन्न इन्द्रियों का होना और चौथा है चेष्टा जिससे अंग संचालित हों। ज्ञान जब जीभ से से बाहर आता है तो वाणी, नेत्र से बाहर आता है तो दृश्य, पांव से चलना फिरना आदि अर्थात नाना प्रकार की चेष्टाएं। पांचवां दैव अर्थात परिस्थिति अनुकूल है, इन्द्रियां अनुकूल हैं, चित्त भी अनुकूल हो। सभी तत्व अनुकूल हों, यह प्रारब्ध वश होता है। इन हेतुओं से कर्म की रचना होती है।

कोई भी कर्म होने के लिए 05 हेतु आवश्यक है.
1-शरीर
2-जीवात्मा
3-इन्द्रियाँ
4-चेष्टा
5- दैव- अनुकूलता
बिना शरीर के कर्म नहीं हो सकता. मृत शरीर से  कर्म नहीं हो सकता.
इन्द्रिय ज्ञान  के बिना कर्म नहीं हो सकता.जैसे दृश्य ज्ञान  के बिना आँखों के देखा नहीं जा सकता. श्रवण ज्ञान  के बिना सुना नहीं जा सकता.
कर्मेन्द्रियों की कार्य प्रणाली ठीक  होनी चाहिए.
परिस्थितियां, इन्द्रियां, चित्त भी अनुकूल होने चाहिए इसे दैव कहा है. इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि यह देह पूर्व जन्मों के किन कर्मों के भोग के लिए प्राप्त हुआ है. यदि तदनुकूल परिस्थिति हो तो व्यक्ति सफल होगा.



Saturday, November 10, 2012

तेरी गीता मेरी गीता -2- बसंत प्रभात


प्रश्न-  आपने कहा कि केवल कहना कि मैं आत्मा हूँ अपने को धोबी का कुत्ता बनाना है जो न घर का रहता है न घाट का. इससे आपका क्या तात्पर्य है?
उत्तर- मैं आत्मा हूँ,  मैं परमात्मा हूँ यह ब्राह्मी  स्थिति है अतः उपलब्धि का विषय है. क्या कोइ डॉक्टर डॉक्टर  कहने से डॉक्टर हो सकता है. कोई भी शिक्षा क्रिया द्वारा ही प्राप्त हो सकती है  केवल कहने से कुछ भी सिद्ध नहीं होता. विचार, क्रिया और अनुभूति से ही इस ओर बड़ा जा सकता है. अक्रिय होने के लिए भी क्रिया करनी होगी. अनासक्त होने अथवा संसार से उदासीन होने के लिए भी क्रिया आवश्यक है. बुद्धि से आत्मा में रमण करने के लिए भी क्रिया आवश्यक है. उच्च स्तर में पहुँचने तक यह नियम आवश्यक है.
प्रश्न- गुरु का क्या प्रयोजन है?
उत्तर- शिष्य के प्रतिबोध धरातल को पुष्ट करना ही गुरु का कार्य है.
प्रश्न- क्या गुरु का कार्य बोध कराना नहीं है?
उत्तर- इससे ईश्वर  के कर्म सिद्धांत का विरोध होता है. श्री भगवन भगवद गीता में कहते हैं  कि इस संसार में कर्म से बड़ा कोई भी देने वाला नहीं है.
प्रश्न- शिष्य के कर्म क्षय होने पर भी क्या यही नियम लागू होगा.
उत्तर- कर्म क्षय होते ही शिष्य स्वयं अथवा गुरु कृपा से बोध को प्राप्त हो जाएगा. तुम स्वयं जान जावोगे की तुम, तुम्हारी आत्मा, तुम्हारे गुरु तीनों एक हैं.
प्रश्न- फिर कई लोगों को बाल्यावस्था में बोध बिना कुछ किये केसे हुआ.
उत्तर- यह पूर्व जन्म की साधना का परिणाम होता है.

Friday, November 9, 2012

तेरी गीता मेरी गीता .१.- बसंत प्रभात




प्रश्न -क्या मैं शरीर हूँ ?
उत्तर- यह समझना कि मैं शरीर हूँ जीवन  की महानतम भूल है. मृत्यु के बाद यह शरीर संसार में रह जाता है पर क्या वह तुम होते हो.
प्रश्न -क्या मैं आत्मा हूँ ?
उत्तर- केवल यह कहना कि मैं आत्मा हूँ अपने को धोबी का कुत्ता बनाना है जो न घर का रहता है न घाट का.
कहने से कुछ नहीं बनेगा उसे समझना होगा, जानना होगा, व्यवहार में लाना होगा. विचार को  निरंतर अभ्यास और वैराग्य से पुष्ट करना होगा.
प्रश्न -फिर  मैं कोन हूँ ?
उत्तर- निरंतर इस प्रश्न की खोज करते रहो तब उत्तर अपने आप मिल जायेगा.
प्रश्न - क्या कोई अन्दर से आवाज आएगी.
उत्तर- अन्दर की आवाज से केवल तुम्हारी खोज को बल मिलेगा.
प्रश्न - क्या  कोई प्रकाश दिखाई देगा?
उत्तर- कोई भी दृश्य अथवा प्रकाश वास्तविकता नहीं होगी.
प्रश्न - फिर क्या होगा?
उत्तर - तुम्हारा वास्तविक स्वरूप प्रगट होगा. कोई प्रश्न कोई विचार शेष नहीं रहेगा.तुम पूर्ण ज्ञानमय हो जावोगे.

BHAGAVAD-GITA FOR KIDS

    Bhagavad Gita   1.    The Bhagavad Gita is an ancient Hindu scripture that is over 5,000 years old. 2.    It is a dialogue between Lord ...