Monday, November 12, 2012

तेरी गीता मेरी गीता - ३ - बसंत प्रभात


प्रश्न- क्रिया से अक्रिय होने  को विस्तार से स्पष्ट करें.

उत्तर- क्रिया जीवन का चिन्ह है. बिना क्रिया के जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती. महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आपकी क्रिया सांसारिक है तो आप भोगी हैं, संसार में आसक्त हैं.यही कर्म बंधन है.इसके विपरीत यदि आपकी क्रिया ईश्वरोन्मुख है, आप आत्मरत हैं तो आप अक्रिय हैं. यही भगवदगीता का कर्मयोग है. श्री भगवान कहते हैं जो कर्म में अकर्म को देखता है और अकर्म में कर्म को देखता है वही योगी है. भगवदगीता के पांचवें अध्याय में श्री भगवान सुस्पष्ट करते हैं -

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌ ।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌ ।8।
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌ ।9।

तत्व को जानने वाला योगी, मैं पन के अभाव से रहित हो जाता है और वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूघंता हुआ, भोजन करता, हुआ गमन, करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ, आँख खोलता हुआ, मूँदता हुआ किसी भी शारीरिक कर्म में सामान्य मनुष्य की तरह लिप्त नहीं होता है। वह यह जानता है कि इन्द्रियाँ अपने अपने कार्यों को कर रही हैं अतः उसमें कर्तापन का भाव नहीं होता है।


प्रश्न- भगवदगीता में तीन शब्द आये हैं कर्म, अकर्म, विकर्म. कृपया इन्हें स्पष्ट करें. साथ ही यह भी विस्तार से  बताएं कि स्वाभाविक कर्म से क्या तात्पर्य है?

उत्तर-कर्म शब्द तात्पर्य सकाम कर्म से है, अकर्म वह हैं  जो क्रिया अथवा कर्म कर्तापन के अभिमान को छोड़कर  किये जाते हैं. विकर्म निंदनीय कर्म हैं जेसे अकारण हिंसा, अपशब्द, बलात्कार आदि.
आत्म तत्त्व के जिज्ञांसु साधक और आत्म  ज्ञानियों के लिए सकाम पूजन का निषेध है, यहाँ तक कि स्वर्ग की इच्छा भी त्याज्य है परन्तु यह भी यथार्थ है कि अनेक जन्मों का योग भ्रष्ट पुरुष ही आत्मज्ञान और निष्काम कर्म की ओर अग्रसर होता है. साधारण मनुष्य अनेक इच्छा लिए जीता है, इसलिए फल की इच्छा के साथ  ईश्वर और देव पूजा करता है. इसलिए साधारण मनुष्य के लिए उपदेश है अपने अपने स्वभाव के आधार पर कर्म करते हुए तुम वृद्धि को प्राप्त हो। अपनी उन्नति करो.
भगवद्गीता का अनासक्त कर्म योग जन सामान्य के लिए नहीं है श्री भगवान ने जन सामान्य लिए स्वाभाविक कर्म विधान बताया है.
स्वाभाविक कर्म का अर्थ है जैसी आपकी प्रकृति है वैसे कर्म में लगे रहें. जिसका खेती करना स्वभाव है उसे खेती ही करनी चाहिए वह अच्छा सैनिक या डाक्टर नहीं हो सकता. इसी प्रकार जिसका स्वभाव सैनिक का हो वह अच्छा कृषक नहीं हो सकता. शहरों और कस्बों में आजकल देखा देखी का जमाना है. पड़ोसी का लड़का इंजीनियर तो मेरा क्यों नहीं. बच्चे की रूचि और स्वभाव का कोई मूल्य इन आधुनिक माँ बाप की नजरों में नहीं है. बचपन से नम्बरों की मारा मारी का जमाना है, बच्चे स्वाभाविकता खोते जा रहे हैं. बचपन से तनाव है. चित्त उद्विग्न रहता है. अतःस्वाभाविक कर्म का ज्ञान होना, बच्चे की प्रकृति को जानना तदनुसार उसको शिक्षित करना जरूरी है. इससे चित्त की उद्विग्नता, तनाव  समाप्त हो जाता है. मन प्रसन्न और करुणामय होने लगता है. प्रोग्रेसिव होना अच्छी बात है परन्तु अपनी रूचि और स्वभाव से सम्बंधित होनी चहिये.
जन सामान्य के लिए भगवद्गीता में श्री भगवान स्वाभाविक कर्म का उपदेश देते हैं.

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।35-3।

दूसरे के धर्म से गुण रहित अपना धर्म (स्वभावगत कर्म ) अति उत्तम है। दूसरे का धर्म (स्वभावगत कर्म ) यद्यपि श्रेष्ठ हो या दूसरे के धर्म (स्वभाव) को भली प्रकार अपना भी लिया जाय तो भी उस पर चलना अपनी सरलता को खो देना है क्योंकि हठ पूर्वक ही दूसरे के स्वभाव का आचरण हो सकता है, अतः स्वाभाविकता नहीं रहती। अपने धर्म (स्वभाव) में मरना भी कल्याण कारक है दूसरे का स्वभाव भय देने वाला है अर्थात तुम्हारे अन्दर सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार तुम्हारा जो स्वाभाविक स्वभाव है उसका सरलता पूर्वक निर्वहन करो। तदनुसार कर्म करो.
सभी प्राणी प्रकृति को प्राप्त होते है अर्थात सत्त्व, रज, तम की मात्रा के अनुसार चेष्टा करते हैं। ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा। चेष्टाएं स्वाभाविक रुप से होनी हैं फिर उन्हें क्यों हठ पूर्वक बढ़ाया जाय। अतः अधिक परिश्रम करके दिन रात काम करते हुए भोग प्राप्त करने की विशेष चेष्टा (हठ) बुद्धिमानी नहीं है। विशेष चेष्टा से  तनाव बढ़ता है. चित्त उद्विग्न रहता है.
सहज स्वाभाविक कर्म जो उसे उसकी प्रकृति से मिले हैं को छोड़ दूसरे कर्मों में लगा मनुष्य कर्मों में बंधता है
अच्छा  जीवित शरीर अपने  उत्तम इन्द्रिय ज्ञान  के साथ अपने अंगों का उत्तम  प्रयोग कर ही अनुकूल परिस्थिति होने पर सर्वोत्तम परिणाम देता है.

भगवदगीता के अठारहवें अध्याय में कर्म का विज्ञान बताते हुए श्री भगवान कहते हैं-

कर्म सिद्धि के पांच हेतु कर्ता और आधार
विविध प्रथक चेष्टा करण और पांचवां देव।। 14।।

हे अर्जुन, तू कर्मों के पांच कारण को जान। अधिष्ठान ही जीव की देह है। इस देह में जीव (भोक्ता) इस देह को भोगता है अतः दूसरा तत्व जीव कर्ता है। प्रकृति में आत्मा का प्रतिबिम्ब जीव है, आत्मा का देह भाव जीव है। जीव देह में कर्ता, भोक्ता रूप में रहता है। तीसरा तत्व है करण अर्थात भिन्न भिन्न इन्द्रियों का होना और चौथा है चेष्टा जिससे अंग संचालित हों। ज्ञान जब जीभ से से बाहर आता है तो वाणी, नेत्र से बाहर आता है तो दृश्य, पांव से चलना फिरना आदि अर्थात नाना प्रकार की चेष्टाएं। पांचवां दैव अर्थात परिस्थिति अनुकूल है, इन्द्रियां अनुकूल हैं, चित्त भी अनुकूल हो। सभी तत्व अनुकूल हों, यह प्रारब्ध वश होता है। इन हेतुओं से कर्म की रचना होती है।

कोई भी कर्म होने के लिए 05 हेतु आवश्यक है.
1-शरीर
2-जीवात्मा
3-इन्द्रियाँ
4-चेष्टा
5- दैव- अनुकूलता
बिना शरीर के कर्म नहीं हो सकता. मृत शरीर से  कर्म नहीं हो सकता.
इन्द्रिय ज्ञान  के बिना कर्म नहीं हो सकता.जैसे दृश्य ज्ञान  के बिना आँखों के देखा नहीं जा सकता. श्रवण ज्ञान  के बिना सुना नहीं जा सकता.
कर्मेन्द्रियों की कार्य प्रणाली ठीक  होनी चाहिए.
परिस्थितियां, इन्द्रियां, चित्त भी अनुकूल होने चाहिए इसे दैव कहा है. इसे इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि यह देह पूर्व जन्मों के किन कर्मों के भोग के लिए प्राप्त हुआ है. यदि तदनुकूल परिस्थिति हो तो व्यक्ति सफल होगा.



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