Monday, October 31, 2011

वेदान्त–सरल वेदान्त/saral vedant –अध्याय -७- उपनिषद में ब्रह्म वाचक आनन्द -प्रो बसन्त


                          आनन्द ब्रह्म

श्रुतियों में ब्रह्म को आनंद भी कहा है. पहले आनन्द को जान लें. आनन्द का अर्थ सुख या असीम सुख नहीं है. यह वह स्थिति है जहाँ सुख और दुःख का कोई स्थान नहीं है. यह पूर्ण शुद्ध ज्ञान, परम बोध की स्थिति है. कबीर कहते हैं, वहाँ ज्ञान ही ओढ़नी है ज्ञान ही बिछावन है. नूरे ओढ़न नूरे डासन. मूल तत्त्व परम ज्ञान है जिसे आनन्द कहा है. अंतिम स्थिति  जिससे  बड़ा कुछ भी नहीं है इस स्थिति को जीव अपने में पाकर परम आनंदित हो जाता है. इसलिए ब्रह्म को आनंद कहा है.

उपनिषदों में ब्रह्म के लिए आनन्द शब्द का प्रयोग -

रसो वै सः.२-७- तैत्तिरीयोपनिषद्   

रस को पाकर जीव यह
होता परमानन्द
आनंद आकाश नहिं होत यदि  
को जीवे को रक्ष प्राण
जो सबको आनंद दे
रस स्वरूप आनन्द.२-७- तैत्तिरीयोपनिषद् 

विज्ञानमानन्दं ब्रह्म.३-९-२८-वृह उपनिषद

मथ कर पाता अग्नि को
वायु रोक सब द्वार
आनन्द सोम जँह फैलता
मन तंह होत विशुद्ध .६-२ -श्वेताश्वतरोपनिषद्.

आनंदोब्रह्मेति व्यजानात्.३-६- तैत्तिरीयोपनिषद् 

आनन्द ही पर ब्रह्म है
जान इसे निश्चित परम.३-६- तैत्तिरीयोपनिषद् 

जो जाने आनन्द को
नहीं कोउ भय होत.१-९- तैत्तिरीयोपनिषद्

तैत्तिरीयोपनिषद्  सब आनंदों का केंद्र परमानन्द स्वरूप ब्रह्म को मानता है.

इस प्रकार  जगह जगह उपनिषदों में आनन्द शब्द का प्रयोग ब्रह्म के लिए  जगह जगह  हुआ है.

जान ज्ञान विज्ञान को
स्वयं आत्म आनन्द
परम बोध के अमृत का
साधक करता पान.७-२-२. मुंडकोपनिषद

आत्म योग का श्रवण कर
अनुभव से जो विज्ञ
सूक्ष्म बुद्धी से जानकर
आत्मतत्त्व जो भिज्ञ
मग्न लाभ आनन्द परम में
      नचिकेता तू पात्र.१३-२- कठोपनिषद

सकल भूत यह आत्मा
रखता वश में लोक
बहु निर्मित एक रूप से
जान धीर अनुभूत
आत्मस्थिति देख ज्ञानी
       आनन्द मोक्ष उपलब्ध .१२-२-२- कठोपनिषद

एक अकेला बहुत से
शासक निष्क्रिय तत्व
एक बीज बहु रूप प्रकट हो
धीर आत्म में देख
       धीर देख अस ईश को
       शाश्वत सुख नहिं अन्य.१२-६ श्वेताश्वतरोपनिषद्..

परन्तु जीवात्मा के लिए आनन्द शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है. जीवात्मा और परमात्मा में अंतर भी स्पष्ट किया है. जीवात्मा इस रस स्वरूप परमात्मा को पाकर आनन्द युक्त हो जाता है.

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वेदान्त–सरल वेदान्त/saral vedant –अध्याय -६- उपनिषद में ब्रह्म वाचक आत्मा -प्रो बसन्त



             उपनिषद  में ब्रह्म वाचक -आत्मा
आत्मा, आनन्द, बोध, शिव, रूद्र, ईश, परम ज्ञान, पुरुष,परमदेव,ॐ शब्द उपनिषद  में जगह जगह ईश्वर के लिए आये हैं. यह सभी शब्द ब्रह्म वाचक हैं. परन्तु आत्मा शब्द का सर्वाधिक प्रयोग परब्रह्म परमात्मा के लिए उपनिषदों में हुआ है.

इस आत्मा को कहीं कहीं अंगुष्ठ सम कहा है क्योंकि  अंगुष्ठ  सदा स्व की अनुभूति कराता है. अंगूठा उठा कर हम अपना समर्थन देते हैं. अंगूठा हमें अपना अर्थात स्व का बोध कराता है. यह शरीर का अस्मिता बोधक अंग है. thumbs up and thumbs down इसी स्व के समर्थन का प्रतीक है.
अंगुष्ठ सम से यह भी तात्पर्य है हाथ में अंगूठा सूक्ष्म होते हुए भी महत्वपूर्ण है. आत्मा को अव्यक्त और निराकार बताया गया है केवल सरल शब्दों समझाने के लिए उसे अंगुष्ठ सम कहा है.

अंगुष्ठ मात्र वह पुरुष है
सदा हृदय में वास
मना ईश निर्मल हृदय
प्रत्यक्ष शुद्ध मन साथ
ऐसे ब्रह्म को जानते
                अमृत अमृत को प्राप्त.१३-३. श्वेताश्वतरोपनिषद्..
अंगुष्ठ सम वह पर पुरुष
बुद्धी मध्य है वास
भूत भवि भव ईश है
                राग द्वेष कोऊ नाहिं.१२-२-१-कठोपनिषद

इसी प्रकार जीवात्मा को भी अंगुष्ठ सम रवि तुल्य कहा है अर्थात सूर्य के प्रकाश के समान तेजस्वी और निराकार है, सूर्य का प्रकाश जैसे संसार को प्रभावित करता है उसी तरह देह में जीव सत्ता अपरा प्रकृति को संचालित करती है. जो सुई की नोक के समान निश्चयात्मक बुद्धि और अस्मिता गुणों से युक्त है.

अंगुष्ठ सम रवि तुल्य जो
संकल्प अहं से युक्त
बुद्धि आत्म गुण अराग्र सम
जीव दृष्ट है विज्ञ.८-५- श्वेताश्वतरोपनिषद्..

विडंबना है ज्यादातर भाष्यकार प्रतीकात्मक अंगुष्ठ सम को समझे ही नहीं और श्रुति वचनों में अनर्थ कर दिया है.



उपनिषदों में ब्रह्म के लिए आत्मा शब्द का प्रयोग  -

जो सब में मैं देखता,
मैं देखे सर्वत्र
राग द्वेष से मुक्त वह
सदा आत्म स्वरूप.६- ईशावास्य उपनिषद
केन्द्र चक्र रथ में अरे
हृदय नाड़ि तस देह
तहां वास यह आत्मा
भिन्न नाद आधार
इस अलौकिक आत्म का
करो ॐ मय ध्यान
तमस परे इस बोध का 
अन्य न हेतु उपाय.६-२-२- मुंडकोपनिषद्.

जान ज्ञान विज्ञान को
स्वयं आत्म आनन्द
परम बोध के अमृत का
साधक करता पान.७-२-२. मुंडकोपनिषद्.



आत्म बोध के होत ही
जीव ग्रंथि का नाश
सारे संशय तब मिटें
       कर्म क्षीण हो जांय.८-२-२. मुंडकोपनिषद्.
जब देखे वह परम को
ब्रह्मा का आधार  
पाप पुण्य को त्यागकर
आत्मरूप हो जात.३-१-३. मुंडकोपनिषद्.

नेत्र से न घ्राण से
न वाक इन्द्रियादि से
न कर्म से न तप सकल
ज्ञान के प्रसाद से
विशुद्ध चित्त पुरुष ही
शुद्ध आत्म देखता.८-३-१- मुंडकोपनिषद्.
जो जाने वह स्वयं ही
जगत उसी का रूप
अमल रूप जो भासता
उसी आत्म का ध्यान
विज्ञ बीज का नाश कर
बंधन छूटे कर्म .१-३-२- मुंडकोपनिषद्.

जाने कोई न आत्म को
अल्पज्ञ प्रोक्त अरु सोच
सुविज्ञ प्रोक्त यह ना मिले
अणु से भी अति सूक्ष्म.८-२- कठोपनिषद

आत्म योग का श्रवण कर
अनुभव से जो विज्ञ
सूक्ष्म बुद्धी से जानकर
आत्मतत्त्व जो भिज्ञ
मग्न लाभ आनन्द परम में
नचिकेता तू पात्र.१३-२- कठोपनिषद

बुद्धी गुहा में पैठकर
अणु से अणु अति सूक्ष्म
महत् महत् है आत्मा
विरला साधक विज्ञ
काम शो़क से मुक्त हो
आत्म प्रसीदति प्राप्त.२०-२- कठोपनिषद


प्रवचन से यह ना मिले
श्रवण नहीं बहु बार
यह जिसको स्वीकारता
प्राप्त उसी को होय
प्रकट करे यह आत्मा
निज स्वरूप को दर्श.२३-२- कठोपनिषद

सभी भूत का आत्मा
जान इसे तू गूढ
नहिं प्रत्यक्ष सबके लिए
अतिसूक्ष्म बुद्धि प्रत्यक्ष.१२-३- कठोपनिषद


जिस सत् से है देखता
स्वप्न दिवस जिन दृश्य
विभु महत् है आत्मा
जान धीर नहिं मोह.४ -२-१- कठोपनिषद

मन से प्राप्त यह आत्मा
जग है कुछ नहिं भिन्न
भिन्न भिन्न जग देखता
मृत्यु मृत्यु को प्राप्त.११-२-१- कठोपनिषद

विशुद्ध ज्ञानमय आत्मा
ग्यारह द्वार पुर वास
नर जो पर का ध्यान कर
मिटे शो़क वह पार .१-२-२- कठोपनिषद


परम शुद्ध यह आत्मा
स्वयं प्रकाशित तेज
अंतरिक्ष में वसु वही
जान अतिथि वह द्वार
अनल वही, हवि है वही
सब मानव और देव.१. कठ
वही सत्य अरु व्योम है
जल में, भू में, सकल ॠत
वही देव है सकल गिरि
उसे परम ॠत जान.२-२-२-कठोपनिषद

सकल भूत यह आत्मा
रखता वश में लोक
बहु निर्मित एक रूप से
जान धीर अनुभूत
आत्मस्थिति देख ज्ञानी
       आनन्द मोक्ष उपलब्ध .१२-२-२-कठोपनिषद

दुग्ध घृत परिपूर्ण है
जगत पूर्ण है आत्म
आत्मविद्या तप यज्ञ से
सो परम है प्राप्त
जान आत्म वह तत्त्व है
       कहा उपनिषद् ब्रह्म.१६-१- श्वेताश्वतरोपनिषद्..

एक अकेला बहुत से
शासक निष्क्रिय तत्व
एक बीज बहु रूप प्रकट हो
धीर आत्म में देख
      धीर देख अस ईश को
      शाश्वत सुख नहिं अन्य.१२-६- श्वेताश्वतरोपनिषद्..

श्री भगवान  भगवद्गीता के विभूति योग  में कहते हैं-

सब भूतों के हृदय में, स्थित सबका आत्म
आदि मघ्य अरु अन्त मैं, जान मुझे तू पार्थ।। 20।।

मैं सम्पूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अन्त हूँ अर्थात सभी भूत मुझ आत्मतत्व परमात्मा से प्रकट होते हैं मुझमें स्थित रहते हैं और अन्त में मुझमें ही विलीन हो जाते हैं। हे अर्जुन, मैं सब भूतों में उनके हृदय में स्थित आत्मा हूँ, मैं सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त हूँ, मेरे आत्मतत्व ने इस सृष्टि को धारण किया हुआ है।

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Sunday, October 30, 2011

वेदान्त –सरल वेदान्त –अध्याय -५-ईश्वर का संकल्प-प्रो बसन्त



                        ईश्वर का संकल्प  

छान्दग्योपनिषद  में जगत रचना के विषय में कहा गया है कि  उस सत् ने संकल्प किया कि मैं बहुत हो जाऊँ अन्यत्र एतरीयोपनिषद  में कहा है कि मैं लोकों की रचना करूँ.

पूर्व में अव्यक्त था
नहीं अन्य कोउ और
नहीं कोउ की चेष्टा
लोक रचे संकल्प .१-१-एतरीयोपनिषद्

परमात्मा अकर्ता है अतः वह कर्ता नहीं है और जड़ प्रकृति में संकल्प हो नहीं सकता फिर सृष्टि की रचना कैसे  हुयी.

एक महत्वपूर्ण बात और है कि परमात्मा ने संकल्प किया ,इससे यह स्पष्ट होता है वह हमारी तरह कोई एक है जो संकल्प कर रचना कर्ता है पर ऐसा भी नहीं है.
ईश्वर पूर्ण विशुद्ध  ज्ञान है और  स्रष्टि परम विशुद्ध ज्ञान का विस्तार है. ज्ञान जड़ हो सकता है पर जड़ ज्ञान नहीं हो सकता. इसलिए ज्ञान अनादि सत्ता है. सृष्टि का निर्माण का आदि कारण ज्ञान है जिसमे आदि अवस्था में कोई हलचल नहीं थी, कोई स्पंदन नहीं था. प्रत्येक का निश्चित स्वभाव होता है. ज्ञान में तरंग उठना स्वाभाविक है.
इस कारण  विशुद्ध शांत ज्ञान में ज्ञान का स्फुरण हुआ और ज्ञान शक्ति तथा क्रिया शक्ति का उदय हुआ. ज्ञान और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में मिलने से त्रिगुणात्मक प्रकृति का विस्तार होने लगा. इसे मानव मस्तिष्क के अध्ययन से भी जाना जा सकता है. सामान्यतः भिन्न भिन्न प्रकार की मस्तिष्क तरंगे किसी भी मनुष्य में भिन्न भिन्न अवस्थाओं में देखी जाती हैं जैसे क्रियाशील अवस्था में बीटा तरंग, गहरी नीद में डेल्टा तरंग आदि. इसी प्रकार परम ज्ञान में पहली अवस्था में हाई डेल्टा तरंग स्वतः उत्पन्न हुई जिससे ज्ञानशक्ति और क्रिया शक्ति विस्तृत हुई और बीटा तरंग फैलने लगीं. यह रेडिएन्ट उर्जा लगातार निकलती गयी और कालांतर में वैज्ञानिक अल्बर्ट आयनस्टीन के सूत्र   E=mc2 के आधार पर घनीभूत हुई और पदार्थ बना. इस प्रकार सृष्टि का विस्तार होता गया, हो रहा  है. हिंदू इस परम विशुद्ध ज्ञान को परमात्मा, भगवान, शब्दब्रह्म, अव्यक्त  कहते हैं, बाइबिल ने इसे शब्द (WORD) कहा है, बौद्ध बोध कहते हैं, सिक्ख शबद, नूर और जैन मोक्ष. यह पूर्णतया वैज्ञानिक एवम सत्य है की कोई जड़ पदार्थ चेतन में  बदल सकता है, न चेतन को पैदा कर सकता है अतः सृष्टि का कारण परम ज्ञान है.
विशुद्ध शांत ज्ञान में ज्ञान का स्फुरण ही परमात्मा का संकल्प है . ज्ञान और क्रिया शक्ति के भिन्न भिन्न मात्रा में मिलने से त्रिगुणात्मक प्रकृति का विस्तार जगत का निर्माण है. छान्दग्योपनिषद  में सुस्पष्ट है उस ब्रह्म ने स्वयं ही अपने आपको इस जड़ चेतन जगत के रूप में प्रकट किया.

अव्यक्त था वह पूर्व में
उससे सत् उत्पन्न
स्वयं प्रकट अव्यक्त वह
सुकृत कहा वह जान.१-७. तैत्तिरीयोपनिषद्     
 यह सत्य है कि सब कुछ ब्रह्म (पूर्ण विशुद्ध ज्ञान) ही है. यह जगत उससे ही प्रकट होता है उसी में स्थित रहता है उसी में विलीन हो जाता है.
जो कुछ है वह ब्रह्म है
जन्म उसी में लीन.३-१४-१ -छान्दग्योपनिषद

रचनाकर वह जगत की
प्रविष्ट हुआ जग साथ
वही हुआ सत् वह असत
जड़ चेतन सब रूप.२-६ तैत्तिरीयोपनिषद्
वेदान्त के इसी तत्त्व को श्री भगवान ने सुस्पष्ट रूप से भगवद्गीता में सुस्पष्ट किया है.
मैं अध्यक्ष, साकाश मम, प्रकृति रचा संसार

इसी हेतु इस चक्र में, घूमे जीव सजीव।। 10।।


हे अर्जुन, मेरी अध्यक्षता में प्रकृति सभी चर अचर की रचना करती है। सभी प्राणी सृष्टि के पदार्थों का कारण, परमात्मा की परा और अपरा प्रकृति का परिणाम हैं। यही और भी गहराई से जाने तो ज्ञान शक्ति और क्रिया शक्ति ही सबके लिए उत्तरदायी है। इस कारण ही समस्त जगत का आवागमन चक्र निरन्तर चल रहा है।


भूत प्रकृति बल अवश हो, रचता बारम्बार

मैं निज प्रकृति स्वीकार कर, भूत रचे संसार।। 8।।


परमात्मा जब व्यक्त प्रकृति को अपनी अव्यक्त (परा) प्रकृति द्वारा स्वीकार करते हैं अर्थात अव्यक्त (परा) प्रकृति जब व्यक्त प्रकृति से मिल जाती है तब सृष्टि भिन्न भिन्न आकार ग्रहण करने लगती हैं। प्राणी मात्र का विस्तार होने लगता है और भूत समुदाय बार बार मेरे द्वारा अक्रिय तथा कोई सम्बन्ध न रखने पर भी रचा जाता है।




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Saturday, October 29, 2011

वेदान्त –सरल वेदान्त –अध्याय -४-उत्पत्ति स्थिति एवम प्रलय का कारण-प्रो बसन्त



           उत्पत्ति स्थिति एवम प्रलय का कारण
इस सृष्टि कोई न कोईका कारण अवश्य है और वह कारण है पर ब्रह्म आत्मतत्त्व.
पर ब्रह्म परमात्मा भूतों का आदि, मध्य और अन्त है अर्थात सभी भूत आत्मतत्व परमात्मा से प्रकट होते हैं और उसमें में स्थित रहते हैं और अन्त में उसमें ही विलीन हो जाते हैं। पर ब्रह्म परमात्मा सब भूतों में उनके हृदय में स्थित आत्मा है, जो  सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त है. आत्मतत्व ने इस सृष्टि को धारण किया हुआ है।
इस सृष्टि का आदि अन्त और मध्य ब्रह्म परमात्मा ही है अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा से जन्मती है, परमात्मा में ही  स्थित रहती है और उसमें ही लय हो जाती है। पर ब्रह्म परमात्मा ही सृष्टि का बीज हहै और सृष्टि का विस्तार भी है. इसी ज्ञान को भिन्न भिन्न उपनिषदों में  कहा गया है.

योनि योनी में पैठ एक
जगत लीन जेहि जात
रूप प्रकट बहु आदि में
ईश वरद परदेव
ईश जान निश्चय परम
परम शान्ति को प्राप्त.११-४श्वेताश्वतरोपनिषद्


अक्षर है वह सत्य है
ब्रह्म बीज सब भूत
चिनगी निकलें अग्नि से
जीव जगत तस ब्रह्म
भाव प्रकट परब्रह्म से
ओर उसी में लीन .१ २-१- मुंडक उपनिषद

जब देखे वह परम को
ब्रह्मा का आधार
पाप पुण्य को त्यागकर
आत्मरूप हो जात.३-३-१-. मुंडक उपनिषद


अश्वत्थ सम है यह जगत
नीचे शाखा ऊपर मूल
मूल परे पर ब्रह्म है
वही अमृत वह तत्त्व
सभी उसी के आश्रित
नहीं लँघ कोऊ ब्रह्म.१-२-३-कठ उपनिषद

पर ब्रह्म से उपजे जगत
चेष्टा करते लोक
उठे बज्र सम भय महत्
जो जाने वह मुक्त.२-२-३- कठ उपनिषद
.
कारण सबका परम है
स्वभाव प्रकट रचना विविध
योग सर्वगुण जो करे
एक जगत का ईश.५-५- श्वेताश्वतरोपनिषद्.

कारण होने से ब्रह्म को जगत का निर्माता मान लिया जाता है.

वेदान्त के इसी तत्त्व को श्री भगवान ने विस्तार से भगवद्गीता में सुस्पष्ट किया है.

प्रभु नहिं रचें, वरते प्रकृति, कर्तापन का भाव
यही नियम है कर्म का, यही कर्म फल संयोग।। 14-5।।

परमेश्वर वास्तव में अकर्ता है, वह संसार के जीवों के न कर्तापन की, न कर्मों की, न कर्म फल संयोग की रचना करते हैं; किन्तु स्वभाव ही इस सबका कारण है अर्थात माया का आरोपण जब ईश्वर में कर दिया जाता है तो उसे कर्ता समझने लगते हैं। परन्तु परमात्मा अपने अकर्ता स्वरूप में स्थित रहते हुए कोटि कोटि ब्रह्माण्डों का सृजन कर देते हैं। यह सब उनकी प्रकृति के कारण होता है। मनुष्य में भी प्रकृति (स्वभाव) उसके कर्तापन, कर्म और कर्मफल संयोग का कारण है.

सकल भूत का बीज मैं, पार्थ सनातन जान।। 10-7।।

मैं सभी भूतों का सनातन बीज हूँ। जब न सृष्टि रहती है न प्रकृति, उस समय विशुद्ध पूर्ण ज्ञान शान्त अवस्था में रहता है, जो सृष्टि का बीज है।

जगत समाया अव्यक्त में, स्थित मम सब भूत
अचरज यह तू जान ले, नहिं स्थित मैं भूत।। 4- 9।।

श्री भगवान कहते हैं हे अर्जुन यह सम्पूर्ण सृष्टि निराकार निर्गुण परमात्मा का साकार विस्तार है। यह जगत निर्गुण परमात्मा से विकसित हुआ है। इस सृष्टि को सर्वत्र अव्यक्त परमात्मा ने परिपूर्ण किया है, वह सृष्टि में बर्फ में जल के समान व्याप्त है। सभी भूत (प्राणी और पदार्थ) परमात्मा के संकल्प के आधार पर ही उनमें स्थित हैं परन्तु परमात्मा उनमें स्थित नहीं है।

अविनाशी अश्वत्थ यह नीचे शाखा ऊपर मूल
छंद इसके पर्ण हैं, जाने विज्ञ विभेद।। 1-15।।

श्री भगवान अर्जुन को सृष्टि का रहस्य बताते हुए कहते हैं; इस सृष्टि का जो मूल है वह परब्रह्म परमात्मा मूल से भी ऊपर है अर्थात जहाँ से सृष्टि जन्मी है परमात्मा उससे परे है और माया जिसे अज्ञान कहा है इस सृष्टि का मूल है। उस मूल से परे परब्रह्म से यह अश्वत्थ वृक्ष पैदा होता है। माया इस वृक्ष का मूल है, इस वृक्ष का फैलाव ऊपर से नीचे की ओर है। माया (अज्ञान) उस अव्यक्त (ज्ञान) को आच्छादित कर सुला देती है। फिर उस
माया में अव्यक्त के बीज से माया का अंकुर फूटता है। परम शुद्ध ज्ञान को अज्ञान (माया) क्रमशः अधिक-अधिक आवृत्त करते जाता है। यही अश्वत्थ वृक्ष (संसार) की ऊपर से नीचे की ओर फैलने की गति है।
सम्पूर्ण सृष्टि परमात्मा से जन्मती है, परमात्मा में ही  स्थित रहती है और उसमें ही लय हो जाती है परन्तु परमात्मा सदा अकर्ता रहता है. वह जगत का कारण है तो उपादान भी वही है.

BHAGAVAD-GITA FOR KIDS

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