Monday, January 6, 2020

कोई भी तुमको मुक्ति प्रदान नहीं कर सकता.-111




तुम कितने भोले हो, कितने नादान हो या कितने मूर्ख हो, तुम समझते हो कोई आएगा और तुमको तारेगा. तुमको कोई भी नहीं तार सकता. कोई भी तुमको मुक्ति प्रदान नहीं कर सकता. तुम्हारे अज्ञान को जो तुम्हारे दुख का कारण है उसको कोई दूर नहीं कर सकता. यह तुमको स्वयं करना है.
भगवाद गीता में श्री भगवान्  कहते हैं, 'अपने से अपना उद्धार कर अपने को गिरा मत, तू स्वयं अपना मित्र है तू स्वयं अपना शत्रु है.'
बुद्ध  कहते हैं ''अप्प दीपो भव' अपने दीपक स्वयं बनो.
अष्टावक्र गीता कहती है 'यदि ब्रह्मा विष्णु और शिव भी तेरे गुरु हो तो स्वयं के बिना तेरा उद्धार नहीं हो सकता, तेरी मुक्त नहीं हो सकती, तुझे सत्य का ज्ञान नहीं हो सकता." तुम अपने स्वयं उद्धारक हो इसलिए किसी तारणहार की प्रतीक्षा बंद कर दो और स्वयं से स्वयं का उद्धार करो.

संपूर्ण वेदांत कहता है तुम परम ज्ञान स्वरुप हो तुम्हारे अंदर संपूर्ण प्रकृति और परमात्मा की पूर्ण विशेषताएं हैं, बस तुमको उनको विकसित करना है और इसे कोई भी दूसरा नहीं कर सकता.
तुम्हारे उपदेश, तथाकथित धर्मगुरुओं ने तुमको भ्रम में डाल दिया है. वे तुम्हें मूर्ख बनाते और तुम इतने लालची हो कि तुम सोचते हो कि तुम्हारे कुछ रुपए मत्था टेक देने से तुम्हारा तुम्हारे गुरु तुम्हारा उद्धार कर देंगे. तुम मुक्त हो जाओगे. तुम्हारे लिए कहीं स्वर्ग में या मोक्ष में या कोई अन्य लोक में कोई सीट बुक हो जाए .अरे इससे बड़ी मूर्खता क्या हो सकती है. क्यों नादान बनते हो. अगर तुम्हारे गुरु में कुछ भी सामर्थ होती तो क्या वह तुमसे पैसा लेते. सुख सुख सुविधा लेते. क्या वह अपने लिए सुख सुविधा नहीं जुटा सकते? जो स्वयं के लिए कुछ नहीं कर सकता, जो तुम्हारे भरोसे है उससे तुम अपना उद्धार चाहते हो. उसको अपना तारणहार समझते हो.

मैं तुमको फिर से स्पष्ट कर दूं कि गुरु शब्द परमात्मा के लिए आया है जिसको आज तक न कोई जान पाया ना जाना जा सकता है. पतंजलि योगसूत्र में लिखा है ‘पूर्वमेषामपिगुरु’ अर्थात जो सबसे पहले था वह गुरु है. बाकी जो भी है वह शिक्षक हो सकते हैं, आचार्य हो सकते हैं, उपदेशक हो सकते हैं. वह थोड़ी बहुत तुम्हारी मदद कर सकते हैं. यदि उनको सही रास्ता थोड़ा कुछ पता है तो तुमको अपनी वार्ता द्वारा बता सकते हैं. परंतु उस रास्ते में जाना तो तुमको स्वयं पड़ेगा. बिना तुम्हारे गए तुम्हारा कोई गुरु, तुम्हारा कोई उपदेशक, कोई अवतार तुम्हारा तारण नहीं कर सकता.

अवतार देवी, देवता और सिद्ध तुम्हारा सांसारिक भला यदि तुम्हारे पूर्व जन्म के कर्म  अच्छे हैं या  क्षीण हो गए हैं तो वह कुछ सांसारिक मदद तुम्हारी कर सकते हैं जैसे किसी गरीब आदमी को तुम कुछ धन वस्त्र, जमीन’ भवन देकर मदद कर सकते हो परंतु क्या तुम उसका प्रारब्ध बदल सकते हो. नहीं उसका प्रारब्ध उसके पिछले कर्माधीन है. यदि उसका प्रारब्ध विकट है तो तुम्हारी मदद भी उसके लिए जहर बन जाएगी. अन्यथा प्र्र्रबध क्षीण होने पर तुम्हारी मदद उसके काम में आती है. यही सिद्धांत इस संसार में सदा चलता है.
तो क्या फिर परमात्मा को नहीं मानना चाहिए? परमात्मा से प्रार्थना नहीं करनी चाहिए. जल्दी बाजी मत करिए. सोचिए परमात्मा आपका अस्तित्व है और अस्तित्व आप नहीं आपका आधार है. आप उसे माने तो भी वह का आधार है और आप उसे न माने तो भी वह आपका आधार है. उसे जानने की कोशिश न करें. अपने को ढूंढिए. अपने को ढूंढते हुए शायद आप को कुछ अपने अस्तित्व के बारे में जानकारी हो जाए और उसी क्षण आप एक विलक्षण व्यक्तित्व हो जाएंगे.

प्रार्थना मन को आनंद देती है. मस्तिष्क को शांत करती है. उद्वेगों का शमन करती है. प्रार्थना एक ऐसा सहारा है जो दुखी मनुष्य को एक राहत  प्रदान करती है. परंतु प्रार्थना का सफल होना मनुष्य के पिछले जन्मों के पुरुषार्थ और वर्तमान जन्म के पुरुषार्थ पर निर्भर करता है. पूर्व जन्म के पुरुषार्थ कर्म कहलाते हैं यही कम या अधिक होने पर मनुष्य को दुःख और सुख की अनुभूति कराते हैं और यही विकट होने पर उसके लिए नाना प्रकार के दुःखोंऔर समस्याओं को उत्पन्न करते हैं. प्रार्थना द्वारा दुःखी मन शांत होता है और पुरुषार्थ की ओर अग्रसर होता है. प्रार्थना भी एक प्रकार का पुरुषार्थ ही है जो आपके नित्य किए पुरुषार्थ में वृद्धि करता है.

जहां तक प्रार्थना का प्रश्न है उससे कभी भी आपको आत्मज्ञान नहीं हो सकता. हां आपको सांसारिक, शारीरिक लाभ और शुभ होगा. इसलिए सांसारिक उपलब्धि और स्वास्थ एवं समृद्धि के लिए परमात्मा से की गई प्रार्थना अथवा परमात्मा के किसी स्वरूप से की गई प्रार्थना; इस त्रिगुणात्मक प्रकृति द्वारा आपका कल्याण करती है. परंतु किसी भी प्रार्थना से प्राप्त उपलब्धि एक समय नष्ट हो जाएगी.हाँ प्रार्थना बुद्धि को निर्मल करती है और निर्मल बुद्धि आत्मज्ञान की और अग्रसर होती है.

इसलिए मनुष्य का परम धर्म आत्मज्ञान माना गया है जो उसको स्वयं प्राप्त करना है और स्वयं के द्वारा स्वयं को जानना है जिसमें आपकी कोई मदद नहीं कर सकता. केवल तटस्थ रूप से आपको कुछ अच्छे जानकार रास्ता बता सकते हैं.उन्हें आप  गुरु ,आचार्य अथवा शिक्षक कह सकते हैं.

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